छठ पूजा

Chhath Puja 2020 का शुभ मुहूर्त, पूजा की विधि, और पूजा का महत्व और आरती

छठ पूजा
Chhath puja का शुभ मुहूर्त

Chhath puja मुख्यतः बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में मनाया जाने वाला त्यौहार है| अंग देश के राजा कर्ण सूर्यदेव के उपासक थे| अतः उसी परंपरा के अनुसार इस व्रत में सूर्य देव की पूजा की जाती है| Chhath puja मुख्यतः बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में मनाया जाने वाला त्यौहार है| अंग देश के राजा कर्ण सूर्यदेव के उपासक थे विशेष रूप से पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है|  यह व्रत चार दिवसीय पूजा का कार्यक्रम होता है| अंत में इसमें सूर्य को अर्घ्य देकर इसका समापन किया जाता है| हिन्दू पंचांग के अनुसार यह व्रत दिवाली के ठीक छः दिन बाद कार्तिक मॉस की शुक्ल पक्ष को चतुर्थी से लेकर सप्तमी तक मनाया जाता है|

इस वर्ष यह त्यौहार 13 नवम्बर 2018 दिन मंगलवार को मनाया जायेगा| कार्तिक मॉस में सूर्य अपनी नीच राशि राशि में होता है| षष्ठी तिथि पुत्र की आयु को प्रभावित करती है और सूर्य स्वस्थ्य का स्वामी है| अतः इस पूजा में पुत्र और स्वस्थ्य दोनों की रक्षा हेतु उपासन हो जाती है| इस माह में हम सूर्य की उपासना करके स्वस्थ्य और उर्जा के स्तर को बेहतर बना सकते है| इसे Chhath puja मुख्यतः बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में मनाया जाने वाला त्यौहार है| अंग देश के राजा कर्ण सूर्यदेव के उपासक थे , सूर्य षष्ठी या छठ व्रत भी कहते है|

Chhath puja की विधि

छठ पूजा

लोगो में मान्यता यह है की महाभारत युद्ध के दौरान जब पांडव जब अपना राजपाठ जुएँ में हार गए थे| तब द्रोपदी ने Chhath puja मुख्यतः बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में मनाया जाने वाला त्यौहार है| अंग देश के राजा कर्ण सूर्यदेव के उपासक थे की थी और उपवास रखकर सूर्यदेव की उपासना की थी| इसके फलस्वरूप उन्हें उनका हारा हुआ राजपाठ वापस मिल गया था| तब से लेकर आज तक उससे प्रभावित क्षेत्रों और अब तो संपूर्ण भारत में इस पूजा का प्रचलन हो गया है| यह व्रत चतुर्थी तिथि से प्रारंभ होता है जिसमे व्रत रखने वाले को लगातार 36 घंटे तक बिना खाए पिए रहना होता है|

इस पूजा का पहला दिन कार्तिक मॉस की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है| इसे नहाय-खाय के नाम से जाना जाता है| इसमें सबसे पहले घर की साफ़-सफाई करके व्रत रखने वाली पवित्र तरीके से शुद्ध शाकाहारी तरीके से भोजन निर्माण करती है| भोजन ग्रहण करने के बाद व्रत प्रारंभ होता है| घर के सभी सदस्य व्रत रखने वाले सदस्य के बाद ही भोजन करते है|

छठ पूजा

अगले दिन कार्तिक मॉस की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पूरे दिन व्रत रखा जाता है तथा शाम को व्रत रखने वाले सदस्य भोजन करते है| इसे खरना कहते है| शाम को चावल और गुड़ की खीर बनायीं जाती है| नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है|

अगले दिन षष्ठी को चावल के लड्डू, ठेकुआ, इत्यादि प्रसाद के रूप में बनाया जाता है| शाम को डूबते हुए सूरज की पूजा की जाती है| व्रत रखने वाले सदस्य को स्नान करते हुए सूर्य को अर्घ्य देना होता है| यह पूजा नदी या तालाब पर जाकर की जाती है| अगले दिन सप्तमी को प्रातः फिर से शाम वाली विधि से पूजा की जाती है|

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