राशिफल

aaj ka rashifal
मेष (21-मार्च से 19-अप्रैल तक)
मेष

21/3 - 19/4

aaj ka rashifal
वृषभ (20-अप्रैल से 20-मई तक)
वृषभ

20/4 - 20/5

aaj ka rashifal
मिथुन (21-मई से 20 जून तक)
मिथुन

21/5 - 20/6

aaj ka rashifal
कर्क (21-जून से 22-जुलाई तक)
कर्क

21/6 - 22/7

aaj ka rashifal
सिंह (23-जुलाई से 22-अगस्त तक)
सिंह

23/7 - 22/8

aaj ka rashifal
कन्या (23-अगस्त से 22- सितम्बर तक)
कन्या

23/8 - 22/9

aaj ka rashifal
तुला (23-सितम्बर से 22-अक्टूबर  तक)
तुला

23/9 - 22/10

aaj ka rashifal
वृश्चिक  (23-अक्टूबर से 21-नवम्बर तक)
वृश्चिक

23/10 - 21/11

aaj ka rashifal
धनु (22-नवम्बर से 21-दिसम्बर तक )
धनु

22/11 - 21/12

aaj ka rashifal
मकर (22-दिसम्बर से 19-जनवरी तक)
मकर

22/12 - 19/1

aaj ka rashifal
कुम्भ (20-जनवरी से 18-फरवरी तक)
कुम्भ

20/1 - 18/2

aaj ka rashifal
मीन (19-फरवरी से 20-मार्च तक)
मीन

19/2 - 20/3

Janam Kundali In Hindi by Date of Birth, Time and Place.

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अब आप भी अपनी Janam Kundali In hindi अपनी मात्रभाषा में प्राप्त कर सकते है। इसके लिए केवल अपनी जन्म तिथि, जन्म का समय, जन्म स्थान और ई-मेल  हमारे साथ शेयर करना होगा और इसके उपरांत आप अपनी जन्मकुंडली आपके ई-मेल पर PDF भेज दिया जायेगा। जिसका आप प्रिंट आउट निकल सकते है। (Janam Kundali In hindi) बनाने से पहले आप के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि (Janam Kundali In hindi) क्या महत्त्व है? आपके जीवन से किस प्रकार से सम्बंधित है?

ज्योतिष ज्ञान मनुष्य के जीवन के लिए बहुत ही महत्व पूर्ण है। ज्योतिष की सही जानकारी से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को बहुत ही आसान व सुगम बना सकता है। आधुनिक समय में बहुत सारे लोग ज्योतिष में विश्वास नहीं रखते है। इसका मुख्य करना यह है कि उन्हें ज्योतिष विज्ञान का सही ज्ञान नहीं है। 

दूसरा बड़ा कारण यह है की प्राचीन समय से कई लोग ज्योतिष शाश्त्र के नाम पर मनगढंत कहानिया सुनकर इसे केवल अपनी कमाई का श्रोत बनाया है परन्तु सही जानकारी नहीं दिया इस प्रकार से लोगो में काफी अंधविश्वास फ़ैल गया। आधुनिक समय में शिक्षित वर्ग का इस प्रकार के लोगों से तो विश्वास टूट ही  गया साथ ही उनका ज्योतिष शाश्त्र (Jyotish Sastr) से भी विश्वास ख़त्म हो गया।

ज्योतिष शाश्त्र और मानव जीवन में सम्बन्ध 

 परन्तु जो आपके दिमाग में ज्योतिष शाश्त्र को लेके नकारात्मक भावना है। उसको दूर करके हम आपको ज्योतिष शाश्त्र की सही ज्ञान देते है तथा आपको ज्योतिष शाश्त्र व मानव जीवन के बीच के संबंधो को समझाते है। जैसा की हम सभी जानते है ज्योतिष शाश्त्र में हम ब्रह्माण्ड में उपस्थित सभी ग्रहों, व नक्षत्रों की चाल व स्थिति का अध्ययन करते है।

प्रथ्वी भी ब्रह्माण्ड में उपस्थित एक गृह है।| इस प्रकार से प्रथ्वी उपस्थित समस्त मानव, जीव जंतु  सभी ब्रह्माण्ड का एक हिस्सा है।| वास्तु शाश्त्र के सामंजस्य के अनुसार ब्रह्माण्ड उपस्थिति प्रत्येक कण की  गति व स्थिति परिवर्तन का प्रभाव पूरे ब्रह्माण्ड पर पड़ता है। इस प्रकार से ब्रह्माण्ड में उपस्थिति सभी ग्रहों की चाल व स्थिति परिवर्तन मनुष्य के जीवन व प्रथ्वी पर रहने वाले समस्त को प्रभावित करता है। 

जन्म तिथि से जाने अपना राशिफल

जन्म कुंडली (janam kundali) क्या होती है?

इस प्रकार से हमारे जीवन में ज्योतिष शाश्त्र का बहुत ही महत्व है। परन्तु ज्योतिष विज्ञान (Jyotish Vigyan) के अध्ययन से पहले हमें जन्म कुंडली का अध्ययन बहुत आवश्यक है क्यूंकि ज्योतिष विज्ञानं के अध्ययन का सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण जन्म कुंडली (Janam Kundali) है। जन्म कुंडली के अध्ययन से पहले हमें यह जान लेना चाहिए की जन्म कुंडली क्या होती है।

तो आइये बताते है जन्म कुंडली क्या होती है? जन्म कुंडली वह प्रपत्र होता है जिसमे मनुष्य के जन्म के समय ब्रह्माण्ड के सभी मुख्य ग्रहों की स्थिति का वर्णन होता है। इसकी सहायता से ग्रहों की गति के अनुसार भविष्य में ग्रहों की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है तथा उनसे मानव जीवन में भविष्य में होने वाले प्रभावों की गणना की जाती है।

Janam Kundali In Hindi का महत्व  

अन्य किसी भी शाश्त्र या विज्ञान के अध्ययन से आप केवल भूत या वर्तमान के बारे में अध्ययन कर सकते है और उन्हें बेहतर बनाने के लिए प्रयास कर सकते है। परन्तु ज्योतिष शाश्त्र एक ऐसा विज्ञानं है जिसके अध्ययन के बाद आप अपने भविष्य के जीवन को देख सकते है तथा उससे बेहतर बनाने का प्रयास कर सकते है।

 चूँकि ज्योतिष विज्ञानं का बैकबोन जन्म कुंडली है।अतः आपके लिए जन्म कुंडली का अध्ययन भी अति आवश्यक है। जन्म कुंडली के अध्ययन हेतु जन्म कुंडली का निर्माण करना भी आवश्यक है। जिससे भविष्य में होने वाले हानि व लाभ का पूर्वानुमान लगाकर उनसे बचा जा सके है।

Difference Between Software Kundli and manual Janam Kundali In Hindi 

आजकल जन्म कुंडली प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के ऑनलाइन सॉफ्टवेयर भी उपलब्ध है परन्तु सॉफ्टवेयर द्वारा प्राप्त कुंडली को हम यथार्थ नहीं मान सकते है क्यूंकि सॉफ्टवेयर किसी सिंगल लॉजिक या फार्मूला के अनुसार कार्य करता है परन्तु मानव जीवन या खगोलीय घटनाएँ किसी एक लॉजिक या फार्मूला के अनुसार कभी नहीं चलता है।

यहाँ पर कई सारी अलग-अलग प्रकार की परिस्थितियां होती है जिन्हें किसी एक सूत्र या शर्त में नहीं बाँधा जा सकता है। इसलिए यहाँ पर हम कुशल और अनुभवी ज्योतिषियों (Astrologers) के सहयोग से आपके लिए (Janam Kundali In hindi) सुविधा हिंदी भाषा में प्रदान कर रहे है।

आपके द्वारा दी गयी जानकारी को अपने अनुभवी ज्योतिषियों के साथ शेयर करके आपकी सही जन्म कुंडली का निर्माण करेंगे। जिससे आपके जीवन की समस्त गतिविधियों की यथार्थ जानकारी प्राप्त करना संभव हो पायेगा तथा आप उससे होने वाले हानि लाभ का सही पूर्वानुमान लगा पाएंगे और उससे बचने के उपाय करने में सक्षम रहेंगे।

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अन्नप्राशन संस्कार हिंदू धर्म में सातवां संस्कार है (Annaprashan)

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कहते हैं कि बंगाल में जन्मा व्यक्ति काफी मीठा स्वभाव होता तभी बंगाल के व्यक्ति बहुत अच्छे गायक बनते हैं ऐसा इसीलिए क्योंकि बंगाल की मिठाइयां की खासियत पूरे विश्व में है। एक कहावत बहुत प्रचलित है “जैसा खाया अन्न, वैसा होगा मन”। अर्थात जैसे भोजन तुम करोगे वैसा ही तुम्हारा स्वभाव होगा। अगर आप ज्यादातर सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं तो आपके अंदर सात्विक (Satvik) गुण आएंगे और अगर आप तामसिक भोजन करेंगे तो आपके अंदर तामसिक (Tasmik) व्यवहार की ओर जाएंगे।

इन भोजन से होते दोषों के बुरे प्रभाव को कम करने हेतु ही नवजात को पैदा होने के शुरुआती 6 महीने के बाद ही सप्तम संस्कार (Saptam Sanskar) किया जाता है जिसे हम अन्नप्राशन भी कहते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार अन्नप्राशन संस्कार (Annaprashan Sanskar) का जीवन में अलग ही महत्त्व है। 6 महीने तक केवल माँ का दूध ही शिशु के लिए आवश्यक बताया है और उसके बाद अन्न ग्रहण करने पर उसे अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है। इसके कई महत्व भी है , जाने इसके बारे मे।

अन्नप्राशन संस्कार (Annaprashan) का महत्व

माता के गर्भ में रहते हुए जातक में मलिन भोजन के जो दोष आते हैं उनके निदान व शिशु के सुपोषण हेतु शुद्ध भोजन करवाया जाना चाहिये यह वाक्य “अन्नाशनान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति” का अर्थ है। अन्न किसी जीवन में क्या महत्व देता है, क्या खुशी देता है, यह आप किसी गरीब व्यक्ति से पूछे जिन्हें एक वक्त की रोटी भी नसीब नही हो पाती।

अन्न अपके शरीर को तन्दरुस्त और मजबूत बनाने में सहायता करती है, ताकि हर तमाम परेशानियों को झेल पाओ। अन्न के महत्व का एक अंश, कथा के तौर पर काफी प्रसिद्ध है।

यह अंश महाभारत (Mahabharat) का वह प्रसिद्ध अंश के ठीक बाद कि घटना है जब स्वंय कन्हैया एक औरत द्रोपदी के चीरहरण हुआ उसे बचाने हेतु प्रकट हुए। भीष्म पितामह जब पांडवों को उपदेश दे रहे थे, अच्छी बातों का ज्ञान दे रहे थे, तभी उनकी यह बात सुनते हुए अचानक से द्रोपदी जोर जोर से हसने लगती है, जिससे भीष्म पितामह का ध्यान भंग हो जाता है और वह उपदेश छोड़ द्रोपदी से विनर्मता से उसके हसने का कारण पूछते हैं। द्रोपदी ने कहा की पितामह आपकी अच्छी उपदेश, बहुत अच्छे होते हैं और सुनने में भी अच्छा लगता है, परन्तु जब यह सोचती हूँ कि आपका यह उपदेश उस वक्त कहाँ गया था जब मेरा चीरहरण भरी सभा मे हो रहा था, तब कहाँ खो गई थी यह आवाज, तब कहाँ विलुप्त हो गई थी यह धर्म की बातें, इसीलिए मुझे आज आपकी यह बातें सुनकर हसी आ गई। भीष्म पितामह यह बात सुनकर उतर देते है “पुत्री, उस वक्त मैं जो अन्न का ग्रहण करता था, वह अन्न दुर्योधन का था उसी अन्न से मेरे अंदर का बहता रक्त बनता था। जैसा पापी वह दुर्योधन था वैसा ही अन्न मुझे प्राप्त हुआ। परन्तु अर्जुन के बाणों ने वह पापी रक्त भ दिया, अब मैं वही कहता हूँ जो धर्मानुकूल हैं।

कैसे निभाए अन्नप्राशन संस्कार

अन्नप्रासन संस्कार सातवां संस्कार है। जिसकी क्रिया नवजात शिशु के 6 महीने पश्चात ही शुरआत होता है। इन 6 महीनों में केवल माँ का दूध ही नवजात के लिए उपयुक्त है। जिसे गुजरने के बाद शिशु को भात, दही, शहद और घी आदि को मिश्रित कर खिलाया जाता है। शुद्ध और साफ अन्न शिशु के विकास का रथ निर्धारित करता है।

शिवौ ते स्तां व्रीहीयवावबलासावदोमधौ।

एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतौ अंहस:।।

यह मंत्र का उच्चारण माता पिता को शिशु को मिश्रित प्रसाद चटकाया जाता है ।

इस मंत्र का अर्थ है कि यह प्रसाद शिशु को शक्ति और पुष्टकारक हो।

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Sapno ka Matlab और उनका फल (swapnfal)

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सपना वह है जो हम वास्तविक जिंदगी से अलग हटकर हो भी देखते है। यह सपने दो प्रकार के होते है। एक जो हम सोते हुए देखते है और दुसरे जो हम जागते हुए देखते है। जागते हुए देखे जाने वाले सपने हमारी सोच और इच्छा पर निर्भर करते है परन्तु सोते हुए दिखने वाले सपने अपने आप से मानसिक स्थिति और भविष्य में होने वाली शुभ और अशुभ घटनाओ पर निर्भर करते है। इन सपनो का मतलब (Sapno ka Matlab) इन्ही से संबंधित होता है।

सोते हुए दिखने वाले सपनो में कई प्रकार के सपने हम देखते है। इनमे सुहावने सपने, बुरे सपने, चिकित्सा वाले सपने, आवर्ती सपने, भविष्यवाणी वाले सपने, सांकेतिक सपने इत्यादि सम्मिलित है| हम एक समय में अक्सर इन्ही में से किसी एक या एक से अधिक प्रकार का सपना देखते है। आइये इन सपनो के बारे में थोडा विस्तृत रूप से बताते है।

सुहावने सपनो का मतलब (Suhavane sapno ka matlab):

सुहावने सपने वे सपने होते है जब सपना देखने वाले को ज्ञात हो जाता है कि वह सपना देख रहा है परन्तु वह फिर भी सोता रहता है और सपने का आनंद लेता है तथा सपने में कार्य के परिणाम को प्रभावित करता है। इस प्रकार से देखे गए सपनो को सुहावने या स्पष्ट सपने कहते है। अधिकतर लोग सपने का अहसास होते ही खुद को जगा लेते है इस प्रकार के सपने सुहावने सपनो के अंतर्गत नहीं आते है।

बुरे सपनो का अर्थ (sapno ka arth)

बुरे सपने प्रायः नाम के अनुसार के परेशान करने वाला सपना है जो सपना देखने वाले मनुष्य को परेशान या भयभीत कर देता है। और इसी डर और चिंता के कारण मनुष्य अपनी निद्रा से जाग्रत अवस्था में आ जाता है। यह सपने मनुष्य के वास्तविक जीवन की घटनाओ की आघात और स्थितियों की प्रतिक्रिया हो सकती है। हम जीवन के विशेष स्थिति को अनदेखा कर देते है जिन लोगो को लगातार बुरे सपने आते है वो मनोरोग, बुरी दवाओं के अनुभव, आत्म हत्या जैसी चीजो पर विचार करने वाले लोग हो सकते है।

सपने में सांप, खुश हो जाएंगे आप

सांप को खजाने का रक्षक भी माना गया है। स्वप्न में सांप देखने को शुभ संकेत के रूप में लिया जाता है, परन्तु कई दृश्य नकारात्मक होने पर मजबूर कर देते हैं। जानते हैं सांप का सपने में दिखना शुभ है या अशुभ।

चिकित्सा सम्बन्धी सपनो का मतलब (sapno ka matlab)

कई स्वप्न सम्बन्धियों का मानना है कि चिकित्सा सम्बन्धी सपने हमें स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से बचने और बीमार होने पर ठीक होने में मदद कर सकते है। वे मानते है कि हमारा शरीर सपनो के माध्यम से हमें बताने में सक्षम है कि शारीरिक लक्षण दिखने से पहले हमारे शरीर में कुछ सही नहीं है।

बार बार एक ही सपने (Recurring Dreams) के मतलब

आवर्ती सपने अपने विषय और शीर्षक में थोड़े से बदलाव् के साथ बार बार आते रहते है। कई बार ये सकारात्मक सपने हो सकते है परन्तु अधिकतर ये बुरे सपनो के श्रेणी में आते है। ऐसे सपने अधिकतर इसलिए आते है क्यूंकि वास्तविक जिंदगी में कोई हिस्सा छूट जाता है जो सपने में आकार बार बार याद दिलाता रहता है। जब एक बार आप इन समस्याओं से छुटकारा पा लेते है तो इन सपनो की पुनरावृत्ति होनी बंद हो जाते है।

सांकेतिक सपने

कई बार सपने हमारे जीवन के लिए कुछ सन्देश लेकर आते है। जिनका हमारी वास्तविक जिंदगी से कुछ न कुछ सम्बन्ध होता है। ऐसे सपनो को सांकेतिक सपने कहते है। इन सपनो को पहचानने के लिए हमें ज्योतिष विज्ञानं का सहारा लेना पड़ता है। ज्योतिष शाश्त्र द्वारा इन सपनो का मतलब (Sapno ka Matlab) विस्तृत रूप से समझाया जाता है।

सपनो का मतलब (Sapno ka matlab)

  • पानी देखना
  • वाहन देखना
  • खुद को फसा हुआ देखना
  • दांत निकलते हुए देखना
  • बच्चे देखना
  • पशु देखना
  • पीछा किये जाते हुए देखना
  • खुद की मौत देखना
  • धार्मिक प्रतीक देखना
  • परीक्षा लेते हुए देखना
  • वस्त्र देखना
  • भोजन देखना
  • दानव या राक्षस
  • इमारतें और घर देखना
  • लोगों को मारते हुए देखना
  • पैसा देखना
  • सेक्स करते हुए देखना
  • गिरते हुए देखना
  • सार्वजनिक रूप से नग्न होना
  • किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से मिलना
  • बेवफाई देखना
  • देर होते देखना
  • खो जाना
  • एक कार दुर्घटना देखना
  • गर्भवती होना (लड़कियों)
  • एक खाली कमरा खोजते हुए देखना
  • आपकी सबसे गुप्त इच्छा
  • बिना बढ़े चलते हुए देखना
  • बहुत सारा पानी (बाढ़) देखना
  • एक फिल्म को फिर से बनाते हुए देखना
  • स्लीप पैरालिसिस हो जाना
  • सांप देखना
  • मकड़ियां देखना
  • ततैया या सींग देखना
  • कुत्ते देखना
  • खुद को गीला करना
  • खुद को उड़ाते हुए देखना
  • आग देखना
  • किताबें पढ़ते हुए देखना
  • खुद पर चीटियाँ रेंगते हुए देखना
  • रोते हुए देखना
  • किसी मृत रिश्तेदार को देखना
  • एक पूर्व प्रेमी देखना
  • किसी चीज से छिपना
  • आपके घर में बर्गलर
  • छुरा घोंपा जाना
  • शॉट होना
  • घोड़े देखना
  • किसी को चूमना
  • वास्तव में ऊंची कूद
  • अगवा होना
  • बस या फ्लाइट गुम होना
  • जेल देखना
  • नौकरी छोड़ना
  • भागते हुए देखना
  • सुपर अमीर होना
  • डूबते हुए देखना
  • आप एक रोलरकोस्टर पर हैं
  • टैटू बनवाते हुए देखना
  • एलियंस द्वारा लिया जा रहा है
  • किसी को एक संदेश है
  • सार्वजनिक रूप से यौन होना
  • किसी चीज़ की खोज करना
  • एक पहाड़ पर चढ़ना
  • प्यार में पड़ना
  • बौछार देखना
  • अदृश्य होना
  • जूता खोना
  • किसी जानवर से बात करना
  • ड्रग्स लेते हुए देखना
  • तीखा खाते हुए देखना
  • एक पुराने दोस्त को देखना
  • समय में वापस यात्रा
  • सड़ा हुआ भोजन खाना
  • एक अंग गुम
  • गुप्त गलियारा या कमरा
  • एक जंगल में खो गया
  • अंधेरे में खो जाना
  • जोम्बी देखना
  • कीचड़ या कंक्रीट में फंसना
  • सार्वजनिक बोल
  • अपराध करना
  • किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से मिलना
  • प्राकृतिक आपदा
  • गलत बटन दबाना
  • एक तर्क होना
  • धनवान बनना
  • बचपन का घर देखना
  • वास्तव में बीमार होना
  • किसी बात पर हँसना
  • सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा होना
  • एक पालतू जानवर की मृत्यु
  • अपना फोन खोना
  • हाई अलर्ट देखना
  • भविष्य की भविष्यवाणी करते हुए देखना
  • मिठाई खाते हुए देखना
  • वे हमेशा से ऐसे ही हैं’
  • एक वाद्य बजाना
  • पैदा होते हुए देखना
  • छिपते हुए देखना

स्वप्नफल (swapnfal)

ऐसा माना जाता है कि रात्रि के पहले प्रहर में देखे गए सपनों के फल एक साल बाद पूरे होते है, दुसरे प्रहर में देखे गए सपने के फल छः महीने बाद तीसरे प्रहर के बाद देखे गए सपने तीन महीने के बाद तथा अंतिम प्रहर में देखे गए सपने का फल एक महीने में मिलता है। ब्रह्म मुहूर्त में देखे गए सपने का फल अतिशीघ्र होता है। ऐसे सपनों का फल अधिकतम दस दिनों में मिलता है। दिन में देखे गए सपने निरर्थक होते है। अगर अच्छा सपना देखा है आपने तो तो उसके बाद सोना नहीं चाहिए। इसके बाद स्नान करके पूजन व दैनिक कार्य करने चाहिए।

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इन सात ऊर्जा चक्रों पर काबू पा लिया तो हर मनोकामना होगी पूरी

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ऊर्जा चक्र (Urja Chakra) हर मनुष्य के भीतर होते हैं जो मेरूदंड में अवस्थित होते है और मेरूदंड जिसे अंग्रेजी में Spinal Column के नाम से जानते हैं। मेरुदंड के आधार से ऊपर उठकर खोपड़ी तक फैले होते हैं। इन्हें उर्जा चक्र कहते हैं, क्योंकि संस्कृत में चक्र का मतलब वृत्त, पहिया या गोल वस्तु होता है। इनका वर्णन हमारे उपनिषदों में मिलता है।

प्रत्येक चक्र को एक विशेष रंग में प्रदर्शित किया जाता है एवं उसमे कमल की एक निश्चित संख्या में पंखुड़ियां होती हैं। हर पंखुड़ी में संस्कृत का एक अक्षर लिखा होता है। इन अक्षरों में से एक अक्षर उस चक्र की मुख्य ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है।

हर व्यक्ति के भीतर सात चक्रों का समावेश पाया जाता है। जिन्हें ऊर्जा चक्र कहकर भी सम्बोधित किया जाता है और यह विश्वास दिलाया जाता है कि अगर व्यक्ति ने इन सात ऊर्जा चक्र पर काबू पा लिया तो उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। चक्र शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ पहिया या घूमना को कहा गया है।

योग में चक्र प्राण या आत्मिक ऊर्जा के केन्द्र होते हैं। ये नाड़ियों के संगम स्थान भी होते हैं। यूँ तो कई चक्र हैं पर 5-7 चक्रों को मुख्य माना गया है। यौगिक ग्रन्थों में इनहें शरीर के कमल भी कहा गया है। क्योंकि इसकी आकृति फूलों के समान मानी गई है। कहते हैं कि चक्र शक्ति केंद्र या ऊर्जा की कुंडली है जो कायिक शरीर के एक बिंदु से निरंतर वृद्धि को प्राप्त होनेवाले फिरकी के आकार की संरचना (पंखे प्रेम हृदय का आकार बनाते हैं) सूक्ष्म देह की परतों में प्रवेश करती है। सूक्ष्म तत्व का घूमता हुआ भंवर ऊर्जा को ग्रहण करने या इसके प्रसार का केंद्र बिंदु है।

ऊर्जा चक्र (Urja Chakra) का अन्य वर्णन

ऊर्जा चक्र का ज्ञान होना यह बहुत बड़ा विषय है, जिसे सभी मानव प्रजातियां अपनी सोच समझ के मुताबिक समझते हैं । जैसे कि परमहंस स्वामी महेश्वरानंद चक्र का वर्णन इस तरह करते हैं:

ब्रह्मांड से अधिक मजबूती के साथ ऊर्जा खींचकर इन बिंदुओं में डालता है, इस मायने में यह ऊर्जा केंद्र है कि यह ऊर्जा उत्पन्न और उसका भंडारण करता है। मुख्य नाडि़यां इड़ा, पिंगला और सुषुन्ना (संवेदी, सहसंवेदी और केंद्रीय तंत्रिका तंथ) एक वक्र पथ से मेरूदंड से होकर जाती है और कई बार एक-दूसरे को पार करती हैं। प्रतिच्छेदन के बिंदु पर ये बहुत ही शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र (Saktishali urja kendra) बनाती है जो चक्र कहलाता है। मानव देह में तीन प्रकार के ऊर्जा केंद्र हैं। अवर अथवा पशु चक्र की अवस्थिति खुर और श्रोणि के बीच के क्षेत्र में होती है जो प्राणी जगत में हमारे विकासवादी मूल की ओर इशारा करता है। मानव चक्र मेरूदंड में होते हैं। अंत में, श्रेष्ठ या दिव्य चक्र मेरूदंड के शिखर और मस्तिष्क के शीर्ष पर होता है।

चक्रों के चित्रण करने के तरीके

ऋषियों द्वारा यह कहा गया है कि चक्रों का चित्रण दो तरीके से किया जाता है, जो निम्मनलिखित हैं।

  • फूलों की तरह
  • चक्र की तरह

पहले एक चक्र की परिधि के चारों ओर एक विशेष संख्या में पंखुडि़यों को दिखाया जाता है। बाद में एक निश्चित संख्या की तिली वृत को कई खंडों में बांटती है जिससे चक्र, पहिया या चक्के के समान बन जाता है। हरेक चक्र में एक विशेष संख्या के खंड या पंखुडि़यां होती हैं।

चक्रों के बारे में अधिकतम मूल जानकारियां उपनिषदों से मिलती है, इनका समय बताया जाना कठिन है क्योंकि माना जाता है कि लगभग हजारों साल पहले पहली बार 1200-900 BCE में इन्हें लिखे जाने से पूर्व वे मौखिक रूप से अस्तित्व में थे।

कैसे कार्य करते हैं यह मूल उर्जा चक्र

114 यह संख्या है उन चक्रों की जिसे योग और आयुर्वेद में मूल चक्र का दर्जा प्राप्त है । इनमे से भी 7 चक्रों को ही मूल आधार चक्र माना गया है। आयुर्वेद में नाड़ियों के संगम या उनके एक दूसरे से मिलन को ही चक्र कहा गया है। वैसे तो इन नाड़ियों के मिलन स्थल अधिकतर त्रिकोणाकार ही होते है लेकिन फिर भी इन्हे चक्र कहा जाता है।

दरअसल शरीर में नाड़ियों के इन त्रिकोणीय मिलन बिन्दुओं को चक्र कहने के पीछे इनकी कार्यशीलता या निरंतरता को माना जाता है। शरीर में मौजूद ये त्रिकोण मिलन बिंदु शरीर के एक आयाम से दूसरे आयाम की ओर गतिशीलता को दर्शाते है इसलिए इन्हे चक्र की उपाधी से नवाजा गया है। इन चक्रों का मूल कार्य शरीर की चेतना या ऊर्जा को नीचे से ऊपर की ओर हस्तांतरित करना है।

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कब कौन सा श्राद्ध (Shradh) है? श्राद्ध कर्म विधि

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भारत एक विशाल देश जिसकी सुंदरता इसके भीतर मनाए जाने वाले अनगिनत त्यौहार हैं। भारत विश्व भर में प्रसिद्ध है सिर्फ इसीलिए नहीं कि यहाँ के व्यक्ति दिमागी रूप से हर कार्य के लिए सक्षम हैं परन्तु साथ साथ मे भारत ही ऐसा देश है जहाँ हर धर्म में अपने माता पिता का आदर करना सिखाया गया है हालांकि यह भिन्न भिन्न व्यक्तियों के ऊपर है कि वह इनको मान्यता देते हैं या नहीं परन्तु यहाँ अधिकतर मनुष्य माता पिता को ही यह सुंदर सी दुनिया देखने का श्रेय देते हैं।

श्राद्ध कर्म विधि हिन्दूधर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं। श्राद्ध (Shradh) हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक सनातन वैदिक संस्कार (Sanatan vaidik sanskar) हैं।

जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं, जिनसे गुण व कौशल, आदि हमें विरासत में मिलें हैं। उनका हम पर न चुकाये जा सकने वाला ऋण हैं। उन्होंने हमारे लिए हमारे जन्म के पूर्व ही व्यवस्था कर दी थी। वे हमारे पूर्वज पूजनीय हैं , उन्हें हम इस श्राद्ध पक्ष में स्मरण कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वास्तव में, वे प्रतिदिन स्मरणीय हैं। श्राद्ध पक्ष विशेषतः उनके स्मरण हेतु निर्धारित किया गया हैं। इस धर्म में, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं।

श्राद्ध में करें यह नियम

वैसे तो सच्ची श्रद्धा और समर्पण से श्राध कर्म विधि करें तो पितृ प्रसन्न होते हैं, परंतु कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो श्राद्ध के सभी पुण्य प्राप्त होते हैं। हिन्दू धर्म अनुसार पितर लोक को दक्षिण स्थित कहा गया है इसीलिए दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके श्राध कर्म विधि सम्पूर्ण करेंगे तो अच्छा होगा। यह अवश्य ध्यान रखें कि जब भी आप पिंड दान करें तो पिला या सफेद वस्त्र धारण कर लें यह शुभ माना जाता है।  जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं। श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध या तर्पण करते समय काले तिल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में इसका बहुत महत्व माना गया है। जिस दिन श्राद्ध करें उस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। श्राद्ध के दिन क्रोध, चिड़चिड़ापन और कलह से दूर रहें। पितरों को भोजन सामग्री देने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग किया जाए तो अच्छा है। केले के पत्ते या लकड़ी के बर्तन का भी प्रयोग किया जा सकता है।

श्राद्ध कर्म विधि पक्ष में यह कार्य न करें

श्राद्ध पक्ष के दौरान कई सारी बातों और नियमों का पालन करना जरूरी होता है। ऐसा शास्त्र भी कहते हैं। लेकिन इसी के विपरीत कुछ ऐसे भी कार्य होते हैं, जिन्हें श्राद्ध पक्ष के दौरान करना निषेध है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे तमाम दु:खों और तकलीफों से गुजरना पड़ता है। शास्त्र बताते हैं कि श्राद्ध पक्ष के दौरान मसूर की दाल, धतूरा, अलसी, कुलथी और मदार की दाल का प्रयोग निषेध है। इसके अलावा नशीले पदार्थों के सेवन और तामसिक भोजन करने से भी बचना चाहिए। इसके अलावा शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि श्राद्ध पक्ष (Shradh Paksh) के दौरान शरीर पर तेल या साबुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके अलावा इत्र का भी प्रयोग वर्जित है। श्राध कर्म विधि के दौरान नए घर में प्रवेश की भी मनाही है। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि पितरों की जहां पर मृत्यु हुई होती है वह उसी घर में जाते हैं लेकिन जब उन्हें वहां कोई नहीं मिलता तो उन्हें काफी तकलीफ होती है। शास्त्र कहते हैं कि यदि श्राद्ध पक्ष में निषेध बातों को व्यक्ति नहीं मानता तो उसे दुख, तकलीफ और कलह का सामना करना पड़ सकता है।

श्राद्ध कर्म विधि (Shradh karm vidhi) की तिथियां

13 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध

14 सितंबर- प्रतिपदा

15 सितंबर-  द्वितीया

16 सितंबर- तृतीया

17 सितंबर- चतुर्थी

18 सितंबर- पंचमी, महा भरणी

19 सितंबर- षष्ठी

20 सितंबर- सप्तमी

21 सितंबर- अष्टमी

22 सितंबर- नवमी

23 सितंबर- दशमी

24 सितंबर- एकादशी

25 सितंबर- द्वादशी

26 सितंबर- त्रयोदशी

27 सितंबर- चतुर्दशी

28 सितंबर- सर्वपित्र अमावस्या

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कुंभ (Kumbh) क्या है? इसकी शुरुआत कैसे हुई?

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भारत विश्व का दूसरा सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है। आप यह सोच रहे होंगे कि यह मैं क्यों लिख रहा हूँ यह तो सभी को ज्ञात है तो इसका जवाब है कि भारत में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह हिन्दू धर्म से तालुक्कत रखता हो या नहीं परन्तु वह कुंभ मेला (Kumbh Mela) के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी रखता ही है। हालांकि यह अधूरी जानकारी का श्रेय भारतीय फिल्म को जाता है जिन्होंने यह दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ी की कुंभ मेला में आप परिवार के सदस्यों से बिछुड़ जाते हैं या यूं कहें कि सब अव्यवस्थित रहता है।

इतिहास के ग्रन्थों मे भले ही कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध न हो परन्तु इस देश की धर्म प्राण जनता के हृदय पटल पर इसकी छवि इतनी गहराई से अंकित है कि सदियों से इस पर्व पर एकत्रित होने के लिए किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ती और लोग अपने आप लाखों और करोड़ों की संख्‍या में कुंभ मेला पर्व पर प्रयाग में संगम तट पर एकत्रित हो जाते हैं।

धनतेरस पर करें दीपदान दूर होगा अकाल मृत्यु का भय

धन तेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा तो की जाती है क्योंकि वे देवताओं को अमृत का पान कराकर उन्हें अमरता प्रदान करने के लिये प्रकट हुए थे।

इस पर्व पर हिमालय और कन्याकुमारी की दूरी सिमट जाती है। तथा अरुणाचल प्रदेश और कच्छ एक-दूसरे के पास आ जाते हैं। इस पर्व का आकर्षण ऐसा है कि दूर से और पास से गांव से और नगरों से झोपड़ियों से और महलों से लोग कुंभ नगरी मे सिमटते आ रहे हैं। इनकी भाषा वेश रंग-ढंग सभी एक दूसरे से भिन्न है परन्तु इनका लक्ष्य एक है। सभी की मंजिल एक है।

इनमें पुरुष भी है और स्त्रियां भी बच्चे भी है और गृहस्थ भी धनवान भी है और धनहीन भी परन्तु सभी मे एक भावना और एक सांस्कृतिक समरसता के दर्शन होते हैं। हमारे देश की एकता की इसकी अनेकता के बीच। एकरसता के इस महान संगम को आदि शंकराचार्य ने एक ऐसा सुगठित रूप प्रदान किया जो पिछले हजारों वर्षों से इस देश को उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक एक मजबूत एकता के सूत्र में जकड़े हुए है।

कुंभ कई करोड़ हिन्दू का तीर्थ स्थल है एक ऐसा अद्धभुत पर्व जिसे व्यक्ति अंतरिक्ष से भी देख सके। कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। २०१३ का कुम्भ प्रयाग में हुआ था। फिर २०१९ में प्रयाग में अर्धकुंभ मेले का आयोजन हुआ था।

खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को “कुम्भ स्नान-योग” कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। यहाँ स्नान करना साक्षात् स्वर्ग दर्शन माना जाता है। इसका हिन्दू धर्म मे बहुत ज्यदा महत्व है।

कुंभ मेला से सम्बंधित पौराणिक कथाएं(कुंभ यही से शुरुआत हुआ)

कुंभ मेला के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इन्द्रपुत्र जयन्त अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा। इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया। अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरन्तर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुम्भ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है। जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।

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