राशिफल

aaj ka rashifal
मेष (21-मार्च से 19-अप्रैल तक)
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वृषभ (20-अप्रैल से 20-मई तक)
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मिथुन (21-मई से 20 जून तक)
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कर्क (21-जून से 22-जुलाई तक)
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सिंह (23-जुलाई से 22-अगस्त तक)
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कन्या (23-अगस्त से 22- सितम्बर तक)
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तुला (23-सितम्बर से 22-अक्टूबर  तक)
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वृश्चिक  (23-अक्टूबर से 21-नवम्बर तक)
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धनु (22-नवम्बर से 21-दिसम्बर तक )
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मकर (22-दिसम्बर से 19-जनवरी तक)
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कुम्भ (20-जनवरी से 18-फरवरी तक)
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मीन (19-फरवरी से 20-मार्च तक)

शिव जी की आरती और व्रत विधि

शिव,भोलेनाथ, महादेव, पशुपतिनाथ, या कहो नटराज या महाकाल । हर नाम शिव जी का व्यक्तित्व दर्शाता है । वह अपने भोलेपन के लिए जितना जाने जाते हैं उतना ही अपने क्रोध के लिए भी । भोले के भक्त इनकी आराधना के लिए खासकर शिवरात्रि का बेसब्री से इंतजार करते हैं । शिव जी को रिझाने के लिए भक्त सोमवार को व्रत रखते हैं जिसे सोलह सोमवार का व्रत से नवाजा गया है । भगवान शिव की विस्तृत जानकारी शिव पुराण में लिखित है जिसमें इस बात का भी जिक्र है जब शिव जी को अपने कंठ में विष रखना पड़ा जिसके लिए शिव जी को नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है ।

सोलह सोमवार से सम्बंधित कथा

सोलह सोमवार की व्रत कथा भिन्न है , परन्तु यह कथा भी बहुत महत्वपूर्ण में से एक है । भक्त इसका उच्चारण करके रंक भी राजा बन जाता है । ध्यान रहे जब यह कथा पढ़े तो आप श्रद्धा समेत पढ़े ।

एक सुंदर कन्या थी, जिसे अपनी सुंदरता पे बहुत अभिमान था । वह स्वंय को  स्वर्ग की अप्सरा स्वरूप मानती थी । कहा जाता है कि जब व्यक्ति में अभिमान का दायरा बढ़ जाता है तो वह अपने दिमागी शक्ति का इस्तेमाल त्याग देता है । इस कन्या के मन में भी एक दिन कुछ ऐसा ही आया। उसने विचार किया कि संभवतः वो भी अपनी सुंदरता से किसी की तपस्या भंग कर सकती है। या पूजा करते पुजारियों का ध्यान भटका सकती है। इस विचार के साथ उसने पहले अपना सोलह श्रृंगार किया। अभिमानी कन्या ने अपने कदम वहाँ चला दिए जहाँ ऋषिगण भगवान् शिव की पूजा कर रहे थे। वो अपनी सुन्दरता से ऋषियों को शिव पूजा से विमुख करने का प्रयास करने लगी। ऋषि अपनी पूजा में मग्न रहे। किसी ने भी उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। इस दृश्य ने उसका अभिमान चकनाचूर कर दिया, अब उसे अपनी गलती का ज्ञान होने लगा अलर वह अब इसका परश्चाताप करना चाहती थी ।

उसने ऋषियों से पूछा। इस पर उन्होंने कहा कि तुमने अपने सोलह श्रृंगार के बल पर हमारा धर्म भ्रष्ट करने का जो पापयुक्त प्रयास किया है। उस पाप की मुक्ति के लिए तुम काशी में निवास करो और वहां सोलह सोमवार का व्रत करो। इससे तुम पाप मुक्त हो जाओगी। इसके पश्चात् उस कन्या ने ऐसा ही किया। परमपिता परमात्मा शिव की कृपा से उस कन्या का मन भक्ति के मार्ग पर चल पड़ा। अपना जीवन भोग कर उसने शिवलोक में स्थान पा लिया। जय भोले नाथ। ॐ नमः शिवाय

शिव जी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।

हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।

त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।

सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।

पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।

भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।

शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।

नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

आरती का उच्चारण हमेशा खड़े होकर करें ।

5 चमत्कारी फिटकरी के फायदे

एक रंगहीन रसायन पदार्थ , क्रिस्टल की तरह वेश भूषा एवं जिसे हम पोटैशियम एल्यूमीनियम सल्फेट के रासायनिक नाम से भी जानते हैं। अगर आप इसका हिंदी में नाम याद न कर पा रहें हैं तो बता दें इसे अंग्रेजी में एलम कहा जाता है और हिंदी में फिटकरी। फिटकरी एक ऐसा चमकीला पदार्थ है जिसका इस्तेमाल डॉक्टर हमारे इलाज के दौरान भिन्न भिन्न जगह इस्तेमाल में लाते हैं। आफ्टर शेविंग लोशन के रूप में फिटकरी का इस्तेमाल करते हैं। यह एक कारगर एंटीसेप्टिक है, जिसका प्रयोग त्वचा और स्वास्थ्य के लिए सदियों से किया जा रहा है। यह दिखने में किसी चमचमाते पत्थर-सा लगता है, लेकिन अपने अंदर कई औषधीय गुण छुपाए है।

फिटकरी के प्रकार

फिटकरी के सही प्रकार चुनना यह बिल्कुल उसी तरह का है मानो आप एक प्रशन का उत्तर देना हो और सभी उपलब्ध उत्तरों में सब सही हो। निम्मनलिखित फिटकरी के प्रकार

  • पोटैशियम फिटकरी:- फिटकरी के इस रूप का इस्तेमाल पानी की गंदगी को साफ करने के लिए किया जाता है। 1500 ईसा पूर्व इसका उपयोग हुआ था ।
  • अमोनियम एलम:- एक ठोस सफेद पदार्थ जिसका इस्तेमाल सौंदर्य की देखभाल के लिए होता हो।
  • क्रोम एलम:- इसे क्रोमियम पोटैशियम सल्फेट के नाम से भी जाना जाता है। यह क्रोमियम (एक रासायनिक तत्व) का पोटैशियम डबल सल्फेट है, जिसका इस्तेमाल चमड़ा बनाने की प्रक्रिया में किया जाता है।
  • एल्यूमीनियम सल्फेट:- यह फिटकरी का वह प्रकार है जिसे फिटकरी न भी कहें तो चलेगा। इस कम्पाउन्ड को पेपरमेकर की फिटकरी के रूप में भी जाना जाता है।
  • सोडियम एलम:- इस फिटकरी का इस्तेमाल बेकिंग सोडा को बनाने में लिया जाता है। यह एक अकार्बनिक (Inorganic) कंपाउंड है, जिसे सोडा एलम के नाम से भी जाना जाता है।
  • सेलेनेट एलम:- फिटकरी का वो प्रकार, जिसमें सल्फर की जगह सेलेनियम मौजूद होता है।

फिटकरी के फायदे/लाभ

फिटकरी दिखने में एक सरल सा पदार्थ है, जो घर पर चाहे कम मात्रा में ही हो किसी रूप में पाया जाता है। फिटकरी एक रंगहीन, गंधहीन, पदार्थ है, फिटकरी (alum) का रासायनिक नाम “पोटेशियम एलुमिनियम सल्फेट (potassium aluminium sulphate)” है। फिटकरी को बाहर के देशों में अंग्रेजी में “ऐलम” कहा जाता है। आइए इसके लाभ जानें।

  • दांतो और मसूड़ों की समस्या से निजात:- अगर आप अपने दांत में पायरिया होना या मसूड़ों से खून निकलने को आम समझते हैं तो यह शायद आपकी गलती हो सकती है। इसके लिए आप फिटकरी में थोड़ा नमक मिलाकर सुबह और शाम को उंगली से दांतों में मालिश करें। आपका दर्द ठीक हो जाएगा।
  • चोट लग जाने पर फिटकरी का इस्तेमाल:- अगर आप खिलाडी हैं जिसका खेल से जुड़ाव रहा है तो आपका नाता चोटों से रहता होगा, जिसमे खून निकलना आम रहता है इसके लिए भी आप फिटकरी का इस्तेमाल कर सकते हैं। चोट हालांकि सिर्फ खिलाड़ियों को ही नहीं बल्कि किसी भी मनुष्य को लग सकता है।  थोड़ी सी फिटकरी लेकर उसे पानी में घोलकर चोट वाले स्थान को फिटकरी वाले पानी से धोएं। ऐसा करने से खून का बहना बंद हो जाएगा। अगर आप चाहें तो पानी की जगह फिटकरी का पाउडर भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • गले की खराश मिटाने के लिए:- मौसम के अचानक से बदलाव के कारण व्यक्ति उसमें तुरन्त ढल नहीं पाता और उसकी तबीयत खराब हो सकती है। अमूमन यह मौसमी बीमारी खांसी झुकाम , गले मे खराश होना या भुखार। गले की खराश को मिटाने के लिए एक गिलास गर्म पानी में फिटकरी मिलाकर इस पानी से गले का गरारा करने से गले के दर्द में बहुत आराम मिलता है और इसके साथ-साथ आपका गला और दांत भी साफ हो जाते हैं।
  • आंखों के समस्या :- अगर आपकी आंखों में बार बार कीचड़ आता है। आंखों से धुंधला दिखाई देता है। आंखें लाल हो जाती हैं या आंखों में दर्द होता है। तो इन समस्यायों को ठीक करने के लिए आँखों में डालने वाला गुलाबजल लें उसमें 50 ग्राम फिटकरी पीसकर डालें, फिर इस फिटकरी मिले गुलाब जल को किसी बोतल में भरकर रख लें, और इसे एक-एक बूंद सुबह और शाम डालें ऐसा करने से आंखों को ठंडक मिलती है। आंखों में उत्पन्न सभी रोग समाप्त जाते हैं, तथा आंखों की रोशनी भी बढ़ जाती है।
  • गर्मी में हाथ और पैर पर पसीना आना:-  गर्मी में पसीना आना आम है परन्तु पसीना का अधिक मात्रा में आना भी सही नहीं। ऐसे में ठंडे पानी में फिटकरी को घोलकर इस घोल से अपने हाथों और पैरों को लगातार कुछ दिनों तक धोना चाहिए। ऐसा करने से हाथ और पैर में पसीना आना कम हो जाएगा।

थायराइड का इलाज

व्यक्ति अपने जीवन और म्रत्यु तक के इस सुनहरी कहानी जिसे सामान्य भाषा में ‘जीवन या जिंदगी’ के नाम से नवाजा जाता है , उसके शुरू से अंत तक एक चरित्र है जिसे वह अपने भीतर से निकाल नहीं पाता वह है उसके भीतर उतपन्न होती चिंताएं। चिंता व्यक्ति के उम्र की तरह बढ़ती रहती है। जिसके कारण व्यक्ति अपने सेहत का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रख पाता । अंत मे भारत को उस स्थिति में न चाहते हुए पहुंचा देता है जिससे हम दूर रहना चाहते हैं।

थायराइड क्या है ?

सरल भाषा मे समझा जाए तो यह कोई बीमारी नहीं परन्तु यह तितली के आकार में होने वाली गले में आगे की तरफ पाए जाने वाली एक ग्रंथि होती है। शरीर की कई गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली यह ग्रंथि भोजन को ऊर्जा में बदलने का काम करती है। थायराइड ग्रंथि टी3 यानी ट्राईआयोडोथायरोनिन और टी4 यानी थायरॉक्सिन हार्मोंन का निर्माण करती है। इन हार्मोंस का सीधा असर हमारी सांस, ह्रदय गति, पाचन तंत्र और शरीर के तापमान पर पड़ता है। साथ ही ये हड्डियों, मांसपेशियों व कोलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित करते हैं। जब ये हार्मोंस असंतुलित हो जाते हैं, तो वजन कम या ज्यादा होने लगता है, इसे ही थायराइड की समस्या कहते हैं।

थायराइड के प्रकार

थायराइड के मुख्यत 6 प्रकार के बताए जाते हैं। जिसमे हॉर्मोन्स की मात्रा निर्धारित है। अगर ग्रंथि जरूरत से कम मात्रा में हार्मोंस का निर्माण नहीं करती तो वह हाइपो थायराइड के श्रेणीमें डाल दिया जाता है। यदि जब थायराइड ग्रंथि जरूरत से ज्यादा हार्मोंस का निर्माण करती है तो वह हाइपर थायराइड के नाम पर जाना जाता है। ठीक इसी तरह जब थायराइड ग्रंथि में सूजन आती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली एंटीबॉडी का निर्माण करती है, जिससे थायराइड ग्रंथि प्रभावित होती है उसे थायराइडिटिस के नाम से पहचान मिली है । गॉइटर भोजन में आयोडीन की कमी होने पर होता है, जिससे गले में सूजन और गांठ जैसी नजर आती है। इसका शिकार ज्यादातर महिलाएं होती हैं। इसलिए, महिलाओं में थायराइड रोग के लक्षण अधिक दिखाई देते हैं। थायराइड नोड्यूल इसमें थायराइड ग्रंथि के एक हिस्से में सूजन आ जाती है। यह सूजन कठोर या फिर किसी तरल पदार्थ से भरी हुई हो सकती है। थायराइड कैंसर जब थॉयराइड ग्रंथि में मौजूद टिशू में कैंसर के सेल बनने लगते हैं।

थायराइड के लक्षण

थायराइड के लक्षण का पता लगाना थोड़ा बहुत मुश्किल माना जाता है क्योंकि इसके कुछ न कुछ लक्षण हर व्यक्ति में पाए जाते हैं जैसे कि कब्ज होना, थका सा रहना, तनाव, त्वचा का रूखापन रहना, वजन का बढ़ना, पसीना कम बहना, ह्रदय गति का कम होना,उच्च रक्तचाप,जोड़ों में सूजन या दर्द,पतले और रूखे-बेजान बाल, याददाश्त कमजोर होना,मासिक धर्म का असामान्य होना,प्रजनन क्षमता में असंतुलन,मांसपेशियों में दर्द,चेहरे पर सूजन इतियादी यह लक्षण अमूमन व्यक्तियों में आसानी से मिल जाता है जिसके कारण भिन्न भिन्न हो सकते हैं। परन्तु यदि आपको ऐसे लक्षण से सामना होता है तो यह आभास मत लगाएं की आप थायराइड से पीड़ित है बल्कि तुरन्त एक अच्छे डॉक्टर की सलाह लें।

थायराइड का इलाज

थायराइड का इलाज के लिए हर व्यक्ति को सबसे पहले एक अच्छे डॉक्टर की सलाह आवश्यक लेनी चाहिए और उनके द्वारा बताए गए दवाई का सेवन समय पर करें वह आपको जल्द से जल्द ठीक करने में सहायता करेगा। साथ ही आप अपने घर में एक चूर्ण भी शुरू कर सकते हैं।

चूर्ण बनाने की विधि :

मेथी, अजवाइन, दालचीनी बराबर मात्रा में लें। इन्हें धूप में सुखाकर बारीक़ पीसकर पाउडर बना लें। ये पाउडर सुबह एवं शाम को खाना खाने के बाद गर्म पानी के साथ लें। इसे ठण्डे पानी के साथ न लें। चाहे गर्मी का ही मौसम हो। हलके गुनगुने पानी के साथ ले लें।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ की सही विधि-आप कैसे करते हैं?

माँ और बच्चों का रिश्ता संसार का सबसे अनमोल रिश्ता माना गया है । मां से कुछ भी प्रेम भावना से मांगो तो माँ अवश्य उस मांग को पूर्ण करती है । तभी माँ के भक्त रूपी बच्चे नवरात्रों का इंतजार बेसब्री से करते हैं । उनके मन में माँ के लिए श्री दुर्गा सप्तशती पाठ करने की लालसा रहती है , परन्तु कई भक्त समय के अभाव के कारण इस पूजा विधि को करने से बचते हैं । परन्तु कई यह पूजा विधि निभाते हैं पर विधि सही न होने के कारण इस पूजा का हानिकारक प्रभाव देखने को मिलता है ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ कैसे करना चाहिए ।

इस पाठ की शुरुआत के पूर्व श्री दुर्गा माँ की मूरत या तस्वीर को पूर्ण रूप से साफ करें और मंदिर में मूरत संग कलश की स्थापना करें । दुर्गा सप्तशती को महान तंत्र ग्रंथ के रूप में माना गया है । शास्त्रों में कहा गया है इस पाठ को पूर्ण विधि विधान से करना चाहिए । इसके करने से भक्तो को मनचाहा फल मिलता है, परन्तु अगर इसके विधि विधान निभाने में कोई चूक हुई तो उसका परिणाम अति असहनीय हो सकता है । इसलिए किसी अन्य देवी-देवता की पूजा-आराधना में भले ही आप विधि व नियमों पर अधिक ध्यान न देते हों, लेकिन यदि आप नवरात्रि में दुर्गा पाठ कर रहे हैं, तो पूर्ण सावधानी बरतना व विधि का पूर्णरूपेण पालन करना जरूरी है। दुर्गा-सप्तशती पाठ शुरू करते समय सर्व प्रथम पवित्र स्थान (नदी किनारे की मिट्टी) की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं। हमारे द्वारा किया गया दुर्गा पाठ किस मात्रा में और कैसे स्‍वीकार हुआ, इस बात का पता इन जौ या गेंहू के अंकुरित होकर बडे होने के अनुसार लगाया जाता है। यानी यदि जौ/गेहूं बहुत ही तेजी से अंकुरित होकर बडे हों, तो ये इसी बात का संकेत है कि हमारा दुर्गा पाठ स्वीकार्य है जबकि यदि ये जौ/गेहूं अंकुरित न हों, अथवा बहुत धीमी गति से बढें, तो तो ये इसी बात की और इशारा होता है कि हमसे दुर्गा पाठ में कहीं कोई गलती हो रही है। फिर उसके ऊपर कलश को पंचोपचार विधि से स्थापित करें। कलश के ऊपर मूर्ति की भी पंचोपचार विधि से प्रतिष्ठा करें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों ओर त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र, पुस्तक तथा शालीग्राम को विराजित कर विष्णु का पूजन करें।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ पुस्तक का मंत्र

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।

प्रकृत्यै भद्रायैनियता:प्रणता:स्मताम्॥

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए ग्रंथ पूजन के बाद श्री देवी कवच, श्री अर्गला स्तोत्रम्, श्री कीलक स्तोत्र का पाठ जरूर कर लेना चाहिए. उसके बाद माता का सिद्ध मंत्र नवार्ण मंत्र “ऊं ऐं ही क्लीं चामुण्डायै विच्चै” की एक माला जप लेनी चाहिए । नवार्ण मंत्रः ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै।

इन बातों का विशेषकर ध्यान रखें

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ की शुभ शुरुआत करने के पूर्व भगवान गणेश जी की आराध्य करें । अगर कलश स्थापना की गई है तो कलश पूजन, नवग्रह पूजन एवं ज्योति पूजन किया जाना आवश्यक है। श्री दुर्गा सप्तशती की पुस्तक को शुद्ध लाल कपड़े के ऊपर रखें । और इसका विधि पूर्वक कुंकुम,चावल और पुष्प से पूजन करें। तत्पश्चात स्वयं अपने माथे पर भस्म, चंदन या रोली लगाकर पूर्वाभिमुख होकर तत्व शुद्धि के लिए 4 बार आचमन करें।  यदि एक दिन में पूरा पाठ न किया जा सके, तो पहले दिन केवल मध्यम चरित्र का पाठ करें और दूसरे दिन शेष 2 चरित्र का पाठ करें। या फिर दूसरा विकल्प यह है कि एक, दो, एक चार, दो एक और दो अध्यायों को क्रम से सात दिन में पूरा करें। श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय यह विशेष ध्यान रखें कि पाठ स्पष्ट उच्चारण में करें, लेकिन जो़र से न पढ़ें और उतावले भी न हों। शारदीय नवरात्र में मां अपने उग्र स्वरूप में होती है। अत: विनयपूर्वक उनकी आराधना करें। नित्य पाठ के बाद कन्या पूजन करना अनिवार्य है। श्रीदुर्गा सप्तशती के प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित्र का क्रम से पाठ करने से, सभी मनोकामना पूरी होती है। इसे महाविद्या क्रम कहते हैं। दुर्गा सप्तशती के उत्तर,प्रथम और मध्य चरित्र के क्रमानुसार पाठ करने से, शत्रुनाश और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसे महातंत्री क्रम कहते हैं। देवी पुराण में प्रात:काल पूजन और प्रात में विसर्जन करने को कहा गया है।  

हनुमान जी की आरती एवं पूजा विधि

भारत वर्ष के सबसे पहले सुपरहीरो से विख्यात पवनपुत्र हनुमान । श्री राम जी के परम भक्त श्री हनुमान जी का जन्म त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह 6.03 बजे भारत देश में आज के झारखंड राज्य के गुमला जिले के आंजन नाम के छोटे से पहाड़ी गाँव के एक गुफा में हुआ था। इनके अन्य नाम मे मारुति नन्दन, बजरंगबली, संकटमोचन,शंकर सुवन से भी जाने जाते हैं । इन्हें भगवान शिव जी का भी अवतार माना गया है । इन्द्र के वज्र से हनुमानजी की ठुड्डी (संस्कृत में हनु) टूट गई थी। इसलिये उनको हनुमान का नाम दिया गया। रामायण के अनुसार, हनुमान जी को वानर के मुख वाले अत्यंत बलिष्ठ पुरुष के रूप में दिखाया जाता है। इनका शरीर अत्यंत मांसल एवं बलशाली है। उनके कंधे पर जनेऊ लटका रहता है। हनुमान जी को मात्र एक लंगोट पहने अनावृत शरीर के साथ दिखाया जाता है। वह मस्तक पर स्वर्ण मुकुट एवं शरीर पर स्वर्ण आभुषण पहने दिखाए जाते है। उनकी वानर के समान लंबी पूँछ है। उनका मुख्य अस्त्र गदा माना जाता है।

पूजा सामग्री

पूजा की सामग्री में लकड़ी की चौकी लगाएं जिसके ऊपर बिछाने के लिए लाल रंग का कपड़ा लें, क्योंकि लाल रंग हनुमान जी को प्रिय है । अब पूजा हनुमान जी की है तो हनुमान जी की मूरत या हनुमान जी की तस्वीर की स्थापना करें । पूजा के लिए अक्षत/चावल, घी का दीपक, तुलसी पत्ता, धूप,चन्दन, सिन्दूर, रोली, फल, फूल / माला , जल (कलश या लोटे में) भगवान के प्रशाद के लिए लड्डू ।

पूजा विधि

हनुमान जी को भगवान शिव का अवतार माना जाता है । कहा जाता है कि भगवान शिव को मनाना सबसे आसान है तभी तो उन्हें भोले बाबा कहा गया है । हनुमान जी को भी प्रसन्न करना काफी आसान माना गया है । इनकी पूजा विधि कुछ इस प्रकार है । सबसे पहले लकड़ी की चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछा दें तथा उसपे हनुमान जी एवं गणेश जी की मूरत या तस्वीर को साफ करके स्थापित करें । इसके बाद घी का दीपक जलाएं और उसे भी भगवान की मूरत के समक्ष रख दें । इसके पश्चात हाथ जोड़कर गणेश जी की पूजा आगमन करें । गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, यह आपके हर कष्ट को हर लेंगे और आपको एक सुखी जीवन प्रदान करेंगे। पूजा समाप्त होने के बाद हनुमान जी की पूजा आरम्भ करें और हाथ जोड़कर हनुमान जी को पूजा के लिए आमन्त्रण भेजे ।

अब सबसे पहले हनुमान जी को सिन्दूर लगाते हुए इस मंत्र को पढ़े –

दिव्यनागसमुद्भुतं सर्वमंगलारकम् |

तैलाभ्यंगयिष्यामि सिन्दूरं गृह्यतां प्रभो ||

उसके बाद हनुमान जी को फूल अर्पित करते हुए इस मंत्र को पढ़े –

नीलोत्पलैः कोकनदैः कह्लारैः कमलैरपि |

कुमुदैः पुण्डरीकैस्त्वां पूजयामि कपीश्वर ||

कलश से जल अर्पित करने के पश्चात भगवान को लड्डू का भोग लगाएं । धूप और दिप दिखाएं ।

हनुमान जी की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके।।

अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतान के प्रभु सदा सहाई।

दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारी सिया सुध लाए।

लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।

लंका जारी असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे।

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आणि संजीवन प्राण उबारे।

पैठी पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े।

बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।

सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे।

कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।

लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।

जो हनुमानजी की आरती गावै। बसी बैकुंठ परमपद पावै।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।

योगासन क्या है: प्राचीन विज्ञान?

प्रत्येक मनुष्य के लिए अपने जीवनकाल में सेहत के प्रति ध्यान देना बेहद आवश्यक है। प्रतिदिन कम से कम 15 से 20 मिनट अपने स्वास्थ्य को दें, योगासन का अभ्यास करें। इससे आपका मन शांत रहेगा जिससे आपको काम करने की नई ऊर्जा प्राप्त होगी। जानिए योगासन क्या है और इससे सम्बंधित प्राचीन विज्ञान।

योगासन की परिभाषा

योगासन दो भिन्न शब्दों का जोड़ है। यह दो शब्द है योगा और आसन। इसमें आसन का अर्थ है की जब व्यक्ति स्वयं को एक ही स्थिति में अधिक से अधिक समय तक रख सके तो वही  आसन है। पुराणों में योगासन के 84 लाख आसनों का वर्णन किया है परन्तु हम अपने रोजमर्रा की जिंदगी कम ही आसान का इस्तेमाल करते हैं। यह सभी आसन विभिन्न जीव जंतुओं के नाम से पहचाने जाते हैं। हम इनमें से बहुत ही कम आसनों के बारे में जानते हैं। इनमें से मात्र 84 आसन ही ऐसे हैं जिन्हें प्रमुख माना गया है। उनमें से भी वर्तमान में मात्र 20 आसन ही प्रसिद्ध हैं जिन्हें लोग आसानी से कर लेते है। हर विषय मे अपनी रुचि रखने के लिए मशहूर बाबा रामदेव जी ने पूरे विश्व को बताया कि योगासन क्या है, उनके अनुसार इन सभी आसनों का अभ्यास शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वास्थ्य लाभ तन-मन एवं उपचार के लिए किया जाता है।

योगासन के प्रकार

योग शास्त्रों में योग के दो प्रकारों का स्पष्टीकरण दिया है। एक गतिशील आसन  और दूसरा स्थिर आसन। इन दोनों आसन के प्रकार का स्पष्ट वर्णन निम्मनलिखित है।

गतिशील आसन:- यह योग में प्रयास किए जाने वाला वह आसन है जो शरीर को शक्ति के साथ गतिशील प्रदान करता है।

स्थिर आसन:- स्थिर आसन वह आसन है जिनमें अभ्यास को शरीर में बहुत ही कम या बिना गति के किया जाता है। आसन का अभ्यास करते समय स्थिति के समय और सीमा को धीरे धीरे बढाया जाता है। प्रत्येक आसन का अलग स्वास्थ्य लाभ होता है। अलग अलग रोगों से मुक्ति पाने के लिए भी अलग अलग आसन बताये गए हैं। विभिन्न आसन शरीर के विभिन्न हिस्सों पर प्रभाव डालते हैं। इनका पूरा लाभ लेने के लिए आवश्यक है की आप योगासन किसी प्रशिक्षित योग निरीक्षक की देख रेख में ही योगासनों का अभ्यास करें।

आसान करते वक्त कुंभक का विशेष ध्यान रखें

योगासन में प्रचलित अधिकतर सांसों के इस्तेमाल पर केंद्रित रहते हैं उदहारण समझा जाए तो योगासन में सांस लेने और छोड़ने का दौर चलता ही रहता है। सांस रोकने की प्रक्रिया को ही कुम्भक कहते हैं। यदि सांस बाहर छोड़ कर रोकी जाये तो इसे बाह्य कुम्भक कहते हैं, किन्तु यदि सांस अंदर खींच कर रोकी जाये तो इसे आभ्यान्तर कुम्भक कहा जाता है। इसके अलावा योग में ऐसे आसन भी मौजूद हैं जिनमें आप एक स्थिति में आकर सांस लेते रह सकते हैं।

भिन्न चक्रों पर आधारित आसन

हर भिन्न आसन व्यक्ति के शरीर के अलग अलग अंगों के लिए लाभदायक होते हैं । किसी एक आसन में किसी एक चक्र पर अपना ध्यान केंद्रित करना होता है। इससे वो आसन शरीर के किन्हीं खास अंगों पर ही विशेष प्रभाव डालता है। जैसे भुजंगासन करते समय आपको विशुद्धि चक्र पर ध्यान देना होता है। ध्यान करते वक्त व्यक्ति ‘ॐ’ शब्द का उच्चारण करना चाहिए, इससे आप ईश्वर को पाने की शक्ति प्राप्त होगी। आत्मा का परमात्मा से मिलन ही सच्चा योग है।

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