राशिफल

aaj ka rashifal
मेष (21-मार्च से 19-अप्रैल तक)
मेष

21/3 - 19/4

aaj ka rashifal
वृषभ (20-अप्रैल से 20-मई तक)
वृषभ

20/4 - 20/5

aaj ka rashifal
मिथुन (21-मई से 20 जून तक)
मिथुन

21/5 - 20/6

aaj ka rashifal
कर्क (21-जून से 22-जुलाई तक)
कर्क

21/6 - 22/7

aaj ka rashifal
सिंह (23-जुलाई से 22-अगस्त तक)
सिंह

23/7 - 22/8

aaj ka rashifal
कन्या (23-अगस्त से 22- सितम्बर तक)
कन्या

23/8 - 22/9

aaj ka rashifal
तुला (23-सितम्बर से 22-अक्टूबर  तक)
तुला

23/9 - 22/10

aaj ka rashifal
वृश्चिक  (23-अक्टूबर से 21-नवम्बर तक)
वृश्चिक

23/10 - 21/11

aaj ka rashifal
धनु (22-नवम्बर से 21-दिसम्बर तक )
धनु

22/11 - 21/12

aaj ka rashifal
मकर (22-दिसम्बर से 19-जनवरी तक)
मकर

22/12 - 19/1

aaj ka rashifal
कुम्भ (20-जनवरी से 18-फरवरी तक)
कुम्भ

20/1 - 18/2

aaj ka rashifal
मीन (19-फरवरी से 20-मार्च तक)
मीन

19/2 - 20/3

मंत्र का जाप 108 बार करना बेहद शुभ क्यों माना गया हैं?

108 यह वह अंक है जिसको आप कई बार दिनचर्या में सुनते होंगे। हिन्दू धर्म में इस शुभ अंक को बड़ी श्रद्धा समेत इस्तमाल किया जाता है तथा पूजा के वक्त हाथ मे जप के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला माला में भी 108 दाना होता है, इसीलिए यह कहा जाता है कि किसी भी 108 बार मंत्र का जाप करना बेहद शुभ है।

जब श्रद्धालुओं का यह प्रशन होता है कि 108 बार मंत्र का जाप करना क्यों शुभ माना गया है तो हर विशेषज्ञों के भिन्न भिन्न तर्क हैं। क्या आपके दिमाग के भीतर भी इस प्रशन का उत्तर जानने की जिज्ञासा उठी है कि आखिर क्यों 108 बार मंत्र का जाप करना होता है।

108 बार मंत्र का जाप करने का रहस्य

108 बार मंत्र का जाप का कारण हर व्यक्ति भिन्न भिन्न बताता है। जैसे कि ज्योतिष शास्त्र में यह कहा गया है कि ज्योतिष में 12 राशियां मानी गई हैं। इनमें नौ ग्रह भ्रमण करते हैं। ग्रहों और राशियों की संख्या को गुणा किया जाए तो यह मान 108 आता है।

माला का हर मनका ग्रहों और राशियों को अभिव्यक्त करता है। किसी ग्रह के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए विशेष मंत्र का माला से जाप करने के पीछे भी यही सिद्धांत है। ज्योतिष की एक और मान्यता के अनुसार, कुल नक्षत्रों की संख्या 27 है। हर नक्षत्र के चार चरण भी होते हैं। इस प्रकार सभी नक्षत्रों के कुल चरण 108 होते हैं। माला का हर मनका नक्षत्र के एक चरण को अभिव्यक्त करता है।

वैज्ञानिक के अलग तर्क हैं। कहा जाता है कि माला के 108 मनकों और सूर्य की कलाओं का गहरा रिश्ता है। एक साल में सूर्य 2 लाख, 16 हजार बार कलाएं बदलता है। दो बार अपनी स्थिति में परिवर्तन कर छह माह उत्तरायण और छह माह ही दक्षिणायन रहता है। इस प्रकार हर छह माह में सूर्य 1 लाख 8 हजार बार कलाओं में परिवर्तन करता है। संख्या 108,000 में अंतिम तीन शून्यों को हटाकर 108 मनके निर्धारित किए गए हैं। हर मनका सूर्य की कलाओं का प्रतीक है। इसके पीछे मान्यता है कि सूर्य का तेज माला के हर मनके के जरिए व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करता है।

आयुर्वेद की मान्यता के अनुसार एक स्वस्थ व्यक्ति दिन में करीब 21,600 बार सांस लेता है। कहा जाता है कि परमात्मा ने हर प्राणी को निश्चित सांस दी हैं। किसी भी क्षण उसे भूलना नहीं चाहिए। इसलिए माला के मनकों की संख्या को 108 निर्धारित किया गया है ताकि वह रोज दो माला में हर सांस के प्रतीक के तौर पर ईश्वर का स्मरण कर सके।

इन बातों का रखें ध्यान

माला में एक मुख्य मनका भी होता है जिसे सुमेरू कहते हैं। यहीं से मंत्र का जाप शुरू किया जाता है। जब जाप संपूर्ण हो जाता है तो सुमेरू का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि सुमेरू का उल्लंघन करने से मंत्र जाप निष्फल हो जाता है। संख्याहीन मंत्रों के जाप से भी पुण्य नहीं मिलता है। किसी भी स्थिति में माला का सुमेरु लांघना नहीं चाहिए।

माला को अंगूठे और अनामिका से दबाकर रखना चाहिए और मध्यमा उंगली से एक मंत्र जपकर एक दाना हथेली के अंदर खींच लेना चाहिए। तर्जनी उंगली से माला का छूना वर्जित माना गया है। मानसिक रूप से पवित्र होने के बाद किसी भी सरल मुद्रा में बैठें जिससे कि वक्ष, गर्दन और सिर एक सीधी रेखा में रहे।

मंत्र जप पूरे करने के बाद अंत में माला का सुमेरु माथे से छुआकर माला को किसी पवित्र स्थान में रख देना चाहिए। मंत्र जप में कर-माला का प्रयोग भी किया जाता है। तारक मंत्र के लिए सर्वश्रेष्ठ माला तुलसी की मानी जाती है। माला के 108 मनके हमारे हृदय में स्थित 108 नाड़ियों के प्रतीक स्वरूप हैं। माला का 109वां मनका सुमेरु कहलाता है। जप करने वाले व्यक्ति को एक बार में 108 जाप पूरे करने चाहिए। इसके बाद सुमेरु से माला पलटकर पुनः जाप आरंभ करना चाहिए।

काले घोड़े की नाल के अचूक उपाय

भगवान इस सृष्टि के रचनाकार हैं, जिन्होंने इस दुनिया को बनाया और वही हैं जिसके इशारे से ही यह दुनिया ताश के पत्तों के समान कभी भी गिर सकती है। भगवान ने इस दुनिया के साथ साथ इंसान एवं अन्य जीव जंतुओं को जन्म दिया, परन्तु जो नहीं दे पाए वह है भय से मुक्ति। अर्थात कहने का अभिप्राय यह है कि यह पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा असत्य है कि मनुष्य को भय नहीं लगता है या दर्द नहीं होता है। दर्द होता है परन्तु व्यक्ति अपनी मानसिक ताकत का इस्तेमाल कर हर वक्त सभी जीव जंतुओं के लिए सुरक्षा कवच तैयार कर लेता है। ( यहाँ सुरक्षा कवच का अर्थ उस वस्तु या उस उपकरण से हैं जो भिन्न भिन्न असुविधाओं में सुविधाओं का कार्य करता है ) जैसे कि व्यक्ति को ठंड लगे तो गर्म कपड़े एक तरह के सुरक्षा कवच है। वैसे ही अगर बात की जाए घोड़ो की , तो इस सुरक्षा कवच को नाल कहा जाता है। घोड़े की नाल मजबूत लोहे की बनी होती है। इसका आकार अंग्रेजी के U अक्षर के समान होता है। इसका प्रमुख कार्य घोड़े के पैर को सुरक्षा प्रदान करना है।

घोड़े की नाल का व्यक्ति के जीवन मे महत्व

ज्योतिष शास्त्र में घोड़े की नाल का काफी महत्व बताया गया है, हांलांकि कई मनुष्य इस महत्व को पढ़े जाने के बाद इसे भी अंधविश्वास के श्रेणी में डाल देंगे। हम उन्हें गलत नहीं कह रहे क्योंकि सभी का किसी वस्तु को देखने का दृष्टिकोण भिन्न हैं । सभी घोड़ो की नाल में काले घोड़े की नाल को प्रमुख स्थान प्राप्त है। ज्योतिष शिक्षा के मुताबिक घोड़े की नाल व्यक्ति के भाग्य को बदलने की क्षमता रखते हैं। रुके कार्यों को फिर से चालू करने के लिए घोड़े की नाल का प्रयोग किया जाता है। मान्यता है कि जिस प्रकार घोड़े की नाल घोड़े के पैर की सुरक्षा करती है उसी तरह यह घर की भी सुरक्षा करती है। इसी कारण लोग इसे अपने घर के मुख्य द्वार पर लगाना पसंद करते हैं। लोगों का मानना है कि जिस घर के मुख्य द्वार पर काले घोड़े की नाल लगी होती है उस घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं करती है। लोगों को किसी समस्या का सामना भी नहीं करना पड़ता है।

घोड़े की नाल तभी अपना असर दिखाती है जब वह काले घोड़े की हो। कुछ लोग किसी भी नाल को काले घोड़े की नाल बताकर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं। अगर आपको काले घोड़े की नाल कहीं से मिल जाए तो उसे अपने घर जरूर ले आएँ। हो सकता है इस काले घोड़े की नाल की वजह से आपकी किस्मत बदल जाए।

काले घोड़े की नाल के फायदे

आर्थिक संकट यह व्यक्ति के जीवन काल का ऐसा संकट है जिससे कोई भी अनछुआ नहीं रहा। यहाँ आर्थिक संकट मतलब वह संकट जिसमें व्यक्ति के पास धन की कमी हो। धन की कमी किसी भी सबंध में हो सकती है। ज्योतिष विद्या में काले घोड़े की नाल को आर्थिक संकट से निकलने के उपाय में गिना जाता है। आर्थिक संकट के लिए ज्योतिष यह उपाय बताते हैं। काले घोड़े की नाल को किसी शनिवार के दिन अपने घर में ले आएँ। इसके बाद काले घोड़े की इस नाल को सिद्ध कर लें। काले घोड़े की नाल को सिद्ध करना बहुत ही आसान है। काले घोड़े की नाल को सिद्ध करने के लिए इसे सबसे पहले गंगाजल से धो लें। इसके बाद काले घोड़े की नाल को अपने पूजा-स्थल पर रखकर शनिदेव के मंत्र को 108 बार पढ़कर अभिमंत्रित कर लें। इससे काले घोड़े की नाल सिद्ध हो जाएगी। अब इसे एक काले कपड़े में लपेटकर अपनी तिजोरी में रख लें। आपकी मेहनत रंग लाने लगेगी और जल्द ही आपकी तिजोरी भरना शुरू हो जाएगी। इसी तरह यदि आपकी दुकान या आॅफिस में भी उन्नती रुकी हुई है। और आपको लगता है कि यह किसी के तंत्र प्रभाव की वजह से है तो आप दुकान या आॅफिस के मुख्य द्वार पर घोडे की नाल (astrology ghode ki naal)  सीधी (यू अक्षर की तरह) कर लगा सकते है।

यदि आपकी कुंडली में ग्रहो का दोष है और उनका आप पर कुप्रभाव पड रहा है तो अपनी लंबाई के बराबर काला धागा ले। अब इसमें 8 गांठ लगा कर तेल में डूबाएं और घोडे की नाल से बांध कर पेड के नीचे गाड़ दे। इससे अपको काफी राहत मिलेगी।

शनि की साढ़े साती या बुरी नजर से बचने के लिए काले घोडे की नाल से बनी अंगूठी पहनने से भी काफी राहत मिलती है।

क्या होता है पंचक, इसे क्यों माना जाता है अशुभ

ईश्वर हर व्यक्ति को धरती पर जन्म लेने से पहले कुछ कार्य सौंपते हैं जिज़ उस व्यक्ति को अपने समय काल अर्थात जीवन और म्रत्यु के बीच पूर्ण करने होते हैं। यह कार्य किसी भी रूप में हो सकते हैं। इंसान हर कार्य में सफलता चाहता है, इसी मुताबिक उस कार्य के प्रति मेहनत भी करता है परन्तु किसी समय उसे उस प्रकार की सफलता नहीं मिल पाती या यूं कहें कि वह अपनी कोशिशों में असफल हो जाता है। इस वक्त कुछ दोस्त यह बोलके हौसला अफजाई करते है कि आज तुम्हारा वक्त अच्छा नहीं था। इसी अच्छे वक्त न होने को ज्योतिषी भाषा में पंचक का दर्जा प्राप्त है। ज्योतिषी का यह भी कहना है कि इस पंचक वक्त पर हर व्यक्ति को शुभ कार्य से परहेज करना चाहिए। अधिक जानकारी हेतु आगे पढ़िए।

क्या होता है पंचक

पंचक को हिंदू पंचाग में बेहद ही अशुभ काल का दर्ज़ा मिला है। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान शुभ कार्य से निषेध होना चाहिए। ज्योतिष में पंचक को शुभ नक्षत्र नहीं माना जाता है। इसे अशुभ और हानिकारक नक्षत्रों का योग माना जाता है। नक्षत्रों के मेल से बनने वाले विशेष योग को पंचक कहा जाता है। जब चन्द्रमा, कुंभ और मीन राशि पर रहता है, तब उस समय को पंचक कहते हैं। चंद्रमा एक राशि में लगभग ढाई दिन रहता है इस तरह इन दो राशियों में चंद्रमा पांच दिनों तक भ्रमण करता है। इन पांच दिनों के दौरान चंद्रमा पांच नक्षत्रों धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती से होकर गुजरता है। अतः ये पांच दिन पंचक कहे जाते हैं। हिंदू संस्कृति में प्रत्येक कार्य मुहूर्त देखकर करने का विधान है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है पंचक। जब भी कोई कार्य प्रारंभ किया जाता है तो उसमें शुभ मुहूर्त के साथ पंचक का भी विचार किया जाता है। नक्षत्र चक्र में कुल 27 नक्षत्र होते हैं। इनमें अंतिम के पांच नक्षत्र दूषित माने गए हैं। ये नक्षत्र धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र चार चरणों में विभाजित रहता है। पंचक धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से प्रारंभ होकर रेवती नक्षत्र के अंतिम चरण तक रहता है। हर दिन एक नक्षत्र होता है इस लिहाज से धनिष्ठा से रेवती तक पांच दिन हुए। ये पांच दिन पंचक होता है।

ध्यान रखें यह बातें, जब पंचक का समय हो

* पंचक के दौरान जिस समय घनिष्ठा नक्षत्र हो उस समय घास, लकड़ी आदि ईंधन एकत्रित नहीं करना चाहिए, इससे अग्नि का भय रहता है।

*पंचक में किसी की मृत्यु होने से और पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने से उस कुटुंब या निकटजनों में पांच मृत्यु और हो जाती है।

* पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है।

* पंचक के दौरान जब रेवती नक्षत्र चल रहा हो, उस समय घर की छत नहीं बनाना चाहिए, ऐसा विद्वानों का मत है। इससे धन हानि और घर में क्लेश होता है।

* मान्यता है कि पंचक में पलंग बनवाना भी बड़े संकट को न्यौता देना है।

*पंचक के प्रभाव से घनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहता है। शतभिषा नक्षत्र में कलह होने के योग बनते हैं। पूर्वाभाद्रपद रोग कारक नक्षत्र होता है। उत्तराभाद्रपद में धन के रूप में दंड होता है। रेवती नक्षत्र में धन हानि की संभावना होती है।

पंचक का प्रभाव

पंचक के प्रभाव से घनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहता है। शतभिषा नक्षत्र में कलह होने के योग बनते हैं। पूर्वाभाद्रपद रोग कारक नक्षत्र होता है। उत्तराभाद्रपद में धन के रूप में दंड होता है। रेवती नक्षत्र में धन हानि की संभावना होती है।

कब कब पंचक साल 2019 में

प्रत्येक 27 दिन बाद नक्षत्र की पुनरावृत्ति होती है इस लिहाज से पंचक हर 27 दिन बाद आता है। यह दिन कुछ इस प्रकार हैं ।

  • 9 जनवरी दोपहर 1.15 से 14 जनवरी दोपहर 12.53 तक
  • 5 फरवरी सायं 7.35 से 10 फरवरी सायं 7.37 तक
  • 4 मार्च रात्रि 12.09 से 9 मार्च रात्रि 1.18 तक
  • 1 अप्रैल प्रातः 8.21 से 5 अप्रैल तड़के 5.55 तक
  • 28 अप्रैल दोपहर 3.43 से 3 मई दोपहर 2.39 तक
  • 25 मई रात्रि 11.43 से 30 मई रात्रि 11.03 तक
  • 22 जून प्रातः 7.39 से 27 जून प्रातः 7.44 तक
  • 19 जुलाई दोपहर 2.58 से 24 जुलाई दोपहर 3.42 तक
  • 15 अगस्त रात्रि 9.28 से 20 अगस्त को सायं 6.41 तक
  • 11 सितंबर रात्रि 3.26 से 17 सितंबर रात्रि 1.53 तक
  • 9 अक्टूबर प्रातः 9.39 से 14 अक्टूबर प्रातः 10.21 तक
  • 5 नवंबर सायं 4.47 से 10 नवंबर 5.17 तक
  • 2 दिसंबर रात्रि 12.57 से 7 दिसंबर रात्रि 1.29 तक

कछुए की अंगूठी धारण करने का क्या है महत्व

भगवान की मौजूदगी हर जीव जंतुओं में सम्मिलित हैं केवल व्यक्ति को उसे अपने कर्म की दृष्टि से पहचानना होता है। यह सम्मुच दुनिया त्रिदेव (जिनमें ब्रह्मा जी, भगवान विष्णु एवं महाकाल शिव) की रचना है। भगवान विष्णु द्वारा लिए गए समय समय पर कुल दशावतार यह साबित करते हैं कि ईश्वर हर मनुष्य के साथ खड़े हैं वह उन पापीयों का नष्ट करने के लिए अवतार लेते रहते हैं।

इन्ही दशावतार में विष्णुजी जी का कछुआ अवतार भी काफी प्रसिद्ध हैं। कछुए को विष्णुजी का रूप कहा जाता है। कूर्म के अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्रमंथन के समय मंदार पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदर पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एंव असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नोंकी प्राप्ति की।

इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था। यूँ तो कहा जाता है ईश्वर हर जगह पाए जाते हैं हर जीव में परन्तु फिर भी इंसान उन्हें ढूंढता रहता है, इसी ढूंढने की होड़ में वह कई तरह के उपकरण को इस्तेमाल में लाता है। जैसे कि इस लेख में लिखा है कि भगवान विष्णु ने कछुआ का अवतार लिया था तो व्यक्ति कछुए को विष्णु जी का रूप मानकर अपने पास रखना चाहते हैं इसी कड़ी में वह कछुए के चिन्ह बने अंगूठी को धारण करते हैं। इसके कई फायदे भी बताए गए हैं परन्तु कई व्यक्ति इस अंगूठी को फैशन का तमगा हासिल करने के लिए पहनते हैं। जानते हैं कछुए की अंगुठी पहनने के बारे में विस्तार से।

मोती रत्न का प्रभाव और धारण करने की विधि

ज्योतिषी विद्या में चंद्र को कर्क राशि का स्वामी कहा गया है, तथा चंद्र के ही शुभ प्रभाव के लिए ही जातक को मोती रत्न पहनने के लिए कहा जाता है ।

कछुए की अंगूठी पहनने का महत्व

यदि आप भी उन व्यक्तियों में अपना नाम शुमार कर चुके हैं जिन्हें फैशन के नाम इस अंगूठी को धारण करने का मन बना लिया तो ध्यान रखिए कि यह अंगूठी आपको लक्ष्मी माँ की तरह राजा तो बना सकता है, परन्तु ध्यान न दिया जाए तो रंक भी बना सकता है। इसका महत्व निम्मनलिखित हैं।

  • कछुए की अंगूठी को वास्तुशास्त्र में बेहद शुभ माना गया है।
  • यह अंगूठी व्यक्ति के जीवन के कई दोषों को शांत करती है।
  • इसका सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि यह आपके आत्मविश्वास को बनाए ही नहीं रखती बल्कि उसे बढ़ाती भी है। यानि आत्मविश्वास है तो सबकुछ पॉजीटिव और बेहद अच्छा होगा।
  • शास्त्रों के मुताबिक कछुआ जल और थल दोनों में रहने वाला प्रतीक है। इस कारण यह सकारात्मकता और उन्नति का प्रतीक है।
  • हिन्दू शास्त्रों में कछुआ भगवान विष्णु का अवतार भी है।
  • समुद्र मंथन की पौराणिक कथा के मुताबिक कछुआ समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ था और मां लक्ष्मी भी वहीं से आई थीं।इसीलिए वास्तु शास्त्र में कछुए को इतना महत्व प्रदान किया जाता है।
  • कछुए को देवी लक्ष्मी के साथ जोड़कर धन बढ़ाने वाला माना गया है।
  • इसके अलावा यह जीव धैर्य, शांति, निरंतरता और समृद्धि का भी प्रतीक है।

इन बातों का रखना होगा ध्यान

  • कछुए की अंगूठी से मिलने वाले लाभ आपको महीने भर में ही नजर आने लगेंगे। लेकिन इसके लिए आपको कुछ बातों का ध्यान रखना होगा ऐसा न करने पर इस रिंग के नुकसान भी आपको ही झेलने होंगे।
  • वास्तु शास्त्र के मुताबिक कछुए की अंगूठी चांदी से ही बनी हो।
  • यदि आप किसी दूसरी धातु का प्रयोग करना चाहें जैसे कि सोना या कोई अन्य रत्न, तो कछुए के आकार को चांदी में बनवाकर उसके ऊपर सोने का डिजाइन या रत्न को जड़वा सकते हैं।
  • इस अंगूठी को इस तरह बनवाएं कि जो इसे पहनेगा कछुए का सिर उसकी ओर घूमा हुआ हो।
  • यदि इसके विपरीत दिशा में कछुए का मुंह होगा, तो धन आने की बजाय हाथ से चला जाएगा।
  • इस अंगूठी को हमेशा सीधे हाथ की मध्यमा या तर्जनी अंगुली में ही धारण करें।
  • कछुए को मां लक्ष्मी के साथ जोड़ा गया है। इसलिए इसे धारण करने के लिए मां का दिन ही चुनें।
  • यानी आपको इस अंगूठी को शुक्रवार के दिन पहनना चाहिए। इससे मां के हर रूप का आशीर्वाद आप पर बना रहेगा।
  • शुकवार कोइस अंगूठी को खरीदें और घर लाकर मां लक्ष्मी जी की तस्वीर या मूर्ति के सामने रख दें।
  • इसे दूध और पानी के मिश्रण से धोएं और अगरबत्ती करने के बाद ही पहनें।
  • श्रद्धा के मुताबिक यदि आप चाहें तो इस दौरान मां लक्ष्मी के बीज मंत्र का निरंतर जाप भी कर सकते हैं।
  • अक्सर लोगों की आदत होती है कि उंगलियों में पहनी रिंग को घुमाते रहते हैं। जबकि ऐसा करना सही नहीं होता।
  • खासतौर पर यदि आपने कछुआ रिंग पहन ली है, तो उसे घुमाएं नहीं।
  • ऐसा करने से कछुए का मुंह बार-बार दूसरी दिशाओं में घूमता है, जो वास्तु के हिसाब से सही नहीं है।
  • जैसे-जैसे कछुए के मुंह की दिशा बदलेगी, धन के आगमन में भी उतनी ही रुकावटें रहेंगी।

मान्यता कछुए से जुड़ी हुई

कछुए के चार पैर होते हैं जेसे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष का प्रतीक माना गया है।

कछुए का मुख ऊपर की ओर होता है इसलिए उसे स्वर्ग ले जाने वाला द्धार माना जाता है।

जबकि कछुए की पुंछ ऊपर से नीचे की तरफ है इसलिए उसे धरती का प्रवेश द्धार माना जाता है।

कछुए की पीठ को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड माना गया है और उसकी नौ धारियां ब्रह्माण्ड को 9 खण्डों में बांटती है।

कछुए का रंग प्रकर्ति, उम्र सबसे अधिक और शांत जीव होने के कारण उसे मां लक्ष्मी का रूप माना जाता है।

सपने में धार्मिक स्थल देखने का क्या अर्थ होता है

हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि हर व्यक्ति को धरती पर अपने कर्म अनुसार मृत्यु पश्चात जगह मिलती है अर्थात जो व्यक्ति धरती पर अच्छे कार्य करता है उसे स्वर्ग तथा जो बुरा कार्य के लिए प्रचलित है उसे नरक।

यह स्वर्ग असलियत में कैसा होता है किसी को नहीं मालूम परन्तु जो भी स्वर्ग के बारे में कुछ साझा करता है वह यह अवश्य कहता है कि स्वर्ग की दुनिया हूबहू स्वप्न लोक जैसी है। स्वप्न यानी सपना यह व्यक्ति की एक तरह की मानसिक सोच को एक दृश्य दिखाता है। हालांकि सपना देखने का कोई एक समय निर्धारित नहीं होता, यह व्यक्ति दर व्यक्ति अलग अलग होती है। कई व्यक्ति सुबह सपना देखते हैं तो कई निंद्रा अवस्था में। यह बात को भी मान्यता प्राप्त है की सुबह का सपना सच होता है।

सपने मन की एक विशेष अवस्था होते हैं, जिसमें वास्तविकता का आभास होता है। सपनों के आने के पीछे खान-पान और बीमारियों की बड़ी भूमिका होती है। इसके पीछे ग्रह और राशियां भी जिम्मेदार होती हैं। लेकिन हर सपने का कोई अर्थ नहीं होता है। ज्यादातर सपने निरर्थक होते हैं।

सपने में शिव जी दिख जाएं तो क्या अर्थ लगाएं?

सपना मनुष्य की दर्शनीय मानसिक स्थिति है जो व्यक्ति के मन में चल रही होती है अर्थात व्यक्ति पूरे दिन में जिस चीज के बारे में सोचता है या जिस परिस्थितियों के बारे में विचार करता है वह उसे सपनों में दिखता है।

सपने में धार्मिक स्थल का दिखना

हालांकि यह कहा गया है कि स्वप्न में दिखे दृश्य का कोई अर्थ नहीं होता, परन्तु यह हर सपने के लिए सच नहीं है ज्योतिषी विद्या के अनुसार कुछ सपनो का हमारे कुंडली पर प्रभाव पड़ता है। जैसे सपने में सांप का दिखना का भी कुछ शुभ और अशुभ अर्थ निकलता है वैसे ही अगर व्यक्ति को सपने में धार्मिक स्थल दिखे तो इसका भी कई अर्थ निकलते हैं। सपने पर किसी का भी जोर नहीं चलता। हालांकि व्यक्ति के स्वप्न उसकी सोच के मुताबिक ही उतपन्न होते हैं परन्तु फिर भी यह हमारे जीवन मे आने वाले गतिविधियों के कुछ अंश प्रस्तुत करते हैं।

  • सपने में मंदिर दिखना:- हिन्दू धर्म मे भगवान का बहुत उच्च स्थान है हर व्यक्ति खुशी और गम दोनों में भगवान के साथ साझा करते हैं। हर व्यक्ति को अपने दिनचर्या से कुछ समय निकालकर मंदिर अवश्य जाना चाहिए यह बेहद शुभ माना जाता है। जिस भी जगह भगवान का नाम मात्र आ जाए वह अपने आप में शुभ हो जाता है । सपने में यदि अगर मंदिर देखते हैं तो यह एक शुभ स्वप्न हैं। मंदिर के दर्शन हों या आप स्वयं मंदिर गए हों और वहां कुछ दान कर रहे हों तो यह असल जिंदगी में आ रही परेशानियो को दर्शाता है। ऐसा स्वप्न यह संकेत देता है कि व्यक्ति को खुद मंदिर जाकर दान-पुण्य करना चाहिए। साथ ही अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए भगवान को धन्यवाद करना चाहिए।
  • स्वप्न में मस्जिद दिखना:- मस्जिद का स्थान मुस्लिम धर्म के व्यक्तियों में इबादत के लिए इस्तेमाल किया जाता है । शब्द मस्जिद का शाब्दिक अर्थ है ‘प्रणाम’ करने की जगह। उर्दू सहित मुसलमानों की अक्सर भाषाओं में यही शब्द इस्तेमाल होता है। यह अरबी जाति शब्द है। अंग्रेजी और यूरोपीय भाषाओं में इसके लिए ‘मोस्क’ (Mosque) शब्द का प्रयोग किया जाता है हालांकि कई मुसलमान अब अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं में भी मस्जिद (Masjid) प्रयोग करते हैं क्योंकि उनके विचार में यह स्पेनिश शब्द मोसका (Moska) बसमझनी मच्छर से निकला है। लेकिन कुछ लोगों के विचार में यह सही नहीं है। अहले इस्लाम के पास, मस्जिद, वह इमारत मतलब है संसार नमाज़ पार्टी अदा की जाती है। यदि आप सपने में मस्जिद देखते हैं तो यह एक बेहद ही शुभ स्वप्न है। अगर कोई व्यक्ति सपने में मस्जिद देखता है तो उसके जल्द ही उसके जीवन की परेशानियां समाप्त हो जाती है। इस सपने का एक और मतलब होता है। अगर कोई सपने में मस्जिद देखता है तो यह सपना बताता है कि उसके परिवार में किसी तरह की खुशी का आगमन होने वाला है या तो घर में किसी का विवाह हो सकता है या परिवार में किलकारियां गूंज सकती है।
  • स्वप्न में चर्च दिखना:- यदि आप सपने में चर्च देखते हैं तो इस स्वप्न के अनुसार आपको जीवन में शांति प्राप्त होने वाली है। इस समय आपके जीवन की सभी परेशानियां समाप्त होने वाली है। जिससे आपके जीवन में सुख और शांति का आगमन होगा। सपने में चर्च देखने वाले व्यक्ति का मन और मस्तिष्क पूरी तरह से शांतिमय होगा। इस समय वह किसी भी बात की चिंता नहीं करेगा।
  • स्वप्न में गुरुद्वारा दिखना:- यदि आप सपने में गुरुद्वारा देखते हैं तो इस स्वप्न के अनुसार आपके ज्ञान में वृद्धि होने वाली है। यह सपना इस बात का भी सूचक है कि आप इस समय आप किसी प्रतियोगी परिक्षा में भी सफल हो सकते हैं। अगर आपने यह सपना देखा है तो आपके ज्ञान में वृद्धि तो अवश्य होगी। चाहें वह किताबी ज्ञान हो या धार्मिक या किसी और प्रकार का इस सपने का आपको शुभ परिणाम ही मिलेगा।

मोती रत्न का प्रभाव और धारण करने की विधि

इस संसार में अनगिनत रहस्य छुपे हुए हैं, जिसकी खोज में प्रत्येक व्यक्ति अपने समय अनुसार लगा हुआ है। इसी संसार के अद्भुत अनगिनत रहस्यों में से रत्नों का संसार भी है। रत्नों का भी अनोखा संसार है जिसकी खुद की भी हैरान करने वाली दुनिया है। इस रत्न से जुड़े कई रहस्य हैं जिसको व्यक्ति जानने के लिए उत्सुक्त रहता है। हालांकि कई इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि उन्हें रत्नों का पूर्ण ज्ञान है परन्तु रत्नों का विषय अपने आप में ही इतना विशाल है कि इसे जितना जानलो उतना ही कम है।

रत्न को पाने के लिए हर कोई उतावला रहता है, परन्तु इसका उत्तर कोई नहीं दे पाया कि रत्न में ऐसा क्या है, जो यह सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है । चंद्र-रत्न मोती को संस्कृत में मौक्तिक, चंद्रमणि इत्यादि, हिंदी-पंजाबी में मोती एवं अंग्रेजी में पर्ल कहा जाता है l पहचान- शुद्ध एवं श्रेष्ठ मोती गोल, श्वेत, उज्जवल, चिकना, चन्द्रमा के समान कान्तियुक्त, निर्मल एवं हल्कापन लिए होता है l सादगी, पवित्रता और कोमलता की निशानी माने जाने वाला मोती एक चमत्कारी ज्योतिषीय रत्न माना जाता है। इसे मुक्ता, शीशा रत्न और पर्ल (Pearl) के नाम से भी जाना जाता है।

रत्न और स्वास्थ्य | किस बीमारी में कौन सा रत्न पहने

रत्न प्रकृति प्रदत्त एक मूल्यवान निधि है। यह अपनी सुंदरता के कारण लोगो को अपनी ओर आकर्षित करता है हालांकि कई लोग रत्न को केवल दिखावे के लिए इस्तेमाल में लाते हैं ।

चंद्र कर्क राशि के स्वामी है

ज्योतिषी विद्या में चंद्र को कर्क राशि का स्वामी कहा गया है, तथा चंद्र के ही शुभ प्रभाव के लिए ही जातक को मोती रत्न पहनने के लिए कहा जाता है । इसे शीतलता युक्त रत्न भी माना जाता है । अन्य संस्क्रत भाषा मे इस रत्न को मुक्ता कह पुकारा जाता है ।

यह मोती रंग में पीला, फीका सफेद, हल्का नीला, लाल गुलाबी इत्यादि रंगों में बाजार में उपलब्ध हैं।

मोती रत्न के लाभ

ज्योतिष के अनुसार किसी जातक की कुंडली में चंद्रमा की स्थिति व उसके प्रभाव के अनुसार मोती के अलग-अलग लाभ मिलते है इसलिए जब कभी भी आप मोती को धारण करने का मन बनाये तो किसी जानकार से सलाह अवश्य ले । मन व शरीर को शांत व शीतल बनाएं रखने के लिए मोती रत्न को धारण करना चाहिए । नेत्र रोग, गर्भाशय रोग व ह्रदय रोग में मोती धारण करने से लाभ मिलता है । अगर किसी जातक की कुंडली में चन्द्र ग्रह के साथ राहु और केतु के योग बना हो तो मोती रत्न धारण करने से राहू और केतु के बुरे प्रभाव कम होने लगता हैं ।

मोती रत्न धारण करने की विधि

मोती रत्न को शुक्ल पक्ष के किसी भी सोमवार के दिन चांदी की अँगूठी में बनाकर सीधे हाथ की सबसे छोटी ऊंगली में पहनना चाहिए, इसे धारण करने से पूर्व दूध-दही-शहद-घी-तुलसी पत्ते आदि से पंचामृत स्नान कराने के बाद गंगाजल साफ कर दूप-दीप व कुमकुम से पूजन कर इस मंत्र को 108 बार जपने के बाद ही धारण करें ।

मंत्र:- ॐ चं चन्द्राय नमः ।

किसी भी रत्न का सकारात्मक प्रभाव तभी तक रहता है जब तक कि उसकी शुद्धता बनी रहती है ।

स्वास्थ्य में मोती का लाभ

* मानसिक शांति, अनिद्रा आदि की पीड़ा में मोती बेहद लाभदायक माना जाता है।

* नेत्र रोग तथा गर्भाशय जैसे समस्या से बचने के लिए मोती धारण किया जाता है।

* मोती, हृदय संबंधित रोगों के लिए भी अच्छा माना जाता है।

असली एवं नकली मोती रत्न के बीच अंतर कैसे जानें

परीक्षा- (1) गोमूत्र को किसी मिट्टी के बर्तन में डालकर उसमें मोती रात भर रखे, यदि वह अखण्डित रहे तो मोती को शुद्ध (सच्चा) समझे।

परीक्षा- (2) पानी से भरे शीशे के गिलास में मोती डाल दें यदि पानी से किरणे सी निकालती दिखलाई पड़े, तो मोती असली जाने। सुच्चा मोती के अभाव में चंद्रकांत मणि अथवा सफ़ेद पुखराज धारण किया जा सकता है।

असली शुद्ध मोती धारण करने से मानसिक शक्ति का विकास, शारीरिक सौन्दर्य की वृद्धि, स्त्री एवं धनादि सुखो की प्राप्ति होती है। इसका प्रयोग स्मरण शक्ति में भी वृद्धिकारक होता है।

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