भगवान धन्वन्तरि

भगवान धन्वंतरि का यह पौराणिक मंत्र देगा आरोग्य का वरदान

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व्यक्ति अपने जीवनकाल में चिकित्सक से दूर रहना पसंद करते हैं, परन्तु यह नामुमकिन सा लगता है । व्यक्ति चिकित्सक से चाहे जितने भी दूर रहने की कोशिश करें वह कोई न कोई कारण मिल ही जाता है जिससे उसे चिकित्सक के पास जाना पड़ता ही है । तभी कई मनुष्य चिकित्सक को भगवान की उपाधि देते हैं । कहा जाता है जो व्यक्ति किसी की जान बचाए उनमें भगवान स्वंय वास करते हैं , तो उसी प्रकार देखा जाए तो चिकित्सक अनगिनत लोगों की जान बचाते हैं , तो चिकित्सक को भगवान की उपाधि देना गलत नहीं है । ऐसे ही एक महान चिकित्सक रहे धन्वन्तरि हैं । जिन्हें भगवान का दर्जा अथवा यह भी कहा जाता है कि यह विष्णु जी के अवतार हैं । एक पौराणिक कथा के अनुसार धनतेरस पर्व को भगवान धन्वंतरि के आगमन दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भगवान धन्वंतरि कौन हैं?

आयुर्वेद के जनक कहे जाने वाले भगवान धन्वंतरि के बारे में एक पौराणिक कथा में वर्णन किया गया है । जब सभी देवता और दैत्य क्षीरसागर का समुद्र मंथन कर रहे थे उसमें से मूल्यवान वस्तुओं के अलावा भगवान धन्वंतरि भी प्रकट हुए थे। कहते हैं कि जब वे प्रकट हुए थे उनके एक हाथ में सोबे-चांदी के बर्तन थे और दूसरे में जड़ी-बूटियां थीं। यही कारण है कि धनतेरस के दिन लोग सोने-चांदी के बरतना, आभूषण और अन्य वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। लेकिन बहुत ही कम लोग इसदिन अपने लिए आयुर्वेद से जुड़ी चीजों की खरीदारी करते हैं। लोग केवल इस मान्यता को जानते हैं कि धनतेरस पर सोने-चांदी या अन्य धातु की वस्तुओं को खरीदने से भगवान धन्वंतरि की कृपा होती है, लेकिन साथ ही अगर आप अपने स्वास्थ्य को सही बनाने वाली चीजों को भी लेंगे तो भगवान धन्वंतरि अधिक प्रसन्न होते है। भगवान धन्वंतरि धन और स्वास्थ्य के देवता माने जाते हैं। उनके मुताबिक जिस मनुष्य ने अपने जीवन में इन दो चीजों को संभाला लिया, वही सफल मनुष्य है। और ऐसे मनुष्य पर भगवान धन्वंतरि की कृपा हमेशा बनी रहती है।

भगवान धन्वंतरि के बारे में अधिक

भगवान धन्वंतरि के बारे में अधिक वर्णन पुराणों के अतिरिक्त आयुर्वेद ग्रंथों में भी छुट-पुट मिलता है। जिसमें आयुर्वेद के आदि ग्रंथों सुश्रुत्र संहिता चरक संहिता, काश्यप संहिता तथा अष्टांग हृदय में विभिन्न रूपों में उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों भाव प्रकाश, शार्गधर तथा उनके ही समकालीन अन्य ग्रंथों में आयुर्वेदावतरण का प्रसंग उधृत है। इसमें भगवान धन्वंतरि के संबंध में भी प्रकाश डाला गया है। महाकवि व्यास द्वारा रचित श्रीमद भागवत पुराण के अनुसार धन्वंतरि को भगवान विष्णु के अंश माना है तथा अवतारों में अवतार कहा गया है। महाभारत, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, श्रीमद भागवत महापुराणादि में यह उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि देव और असुर एक ही पिता कश्यप ऋषि के संतान थे। किंतु इनकी वंशवृद्ध अधिक हो गई थी अतः अधिकारों के लिए परस्पर लड़ा करते थे। वे तीनों ही लोकों पर राज्याधिकार चाहते थे। असुरों या राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य थे जो संजीवनी विद्या के बल से असुरों का जीवितकर लेते थे। इसके अतिरिक्त दैत्य दानव माँसाहारी होने के कारण हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ तथा दिव्य शस्त्रों के ज्ञाता थे। अतः युद्ध में देवताओं की मृत्यु अधिक होती थी।

भगवान धन्वंतरि की महिमा

अश्विनी को जो स्थान और महत्व वैदिक काल मे मिला ठीक वही स्थान और महत्व पौराणिक काल में भगवान धन्वंतरि को मिला । जहाँ अश्विनी के हाथ में मधुकलश था वहाँ धन्वंतरि को अमृत कलश मिला, क्योंकि विष्णु संसार की रक्षा करते हैं अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अंश माना गया।

भगवान धन्वंतरि के स्मरण के लिए मंत्र

भगवान धन्वंतरि जी को याद करने के लिए सबसे सरल मंत्र यह है ॐ धन्वंतरये नमः॥

इसके अलावा अन्य मंत्र निम्मनलिखित हैं ।

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:

अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणाय

त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप

श्री धन्वंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृत कलश हस्ताय सर्व आमय

विनाशनाय त्रिलोक नाथाय श्री महाविष्णुवे नम: ||

अर्थात

परम भगवन को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरी कहते हैं, जो अमृत कलश लिये हैं, सर्वभय नाशक हैं, सररोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरी को नमन है।

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