ब्रह्मराक्षस और महातांत्रिक के बीच संग्राम काशी की सत्यकथा

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ब्रह्मराक्षस यह शब्द से आपका मिलन कई बार हो चुका होगा परन्तु अर्थ शायद आपको ज्ञात न हो। कहा जाता है कि हर इंसान के भीतर दो गुण पाए जाते हैं, एक अच्छा तो एक बुरा ठीक उसी प्रकार ब्रह्मराक्षस एक ऐसा ब्राह्मण का रूप है जिसमें व्यक्ति के भीतर ज्ञान तो ब्राह्मण स्वरूप ही होता है परन्तु उस ज्ञान का इस्तेमाल बुरे काम कद लिए होता है इसीलिए इन्हें ब्रह्मराक्षस कहा जाता है। इनकी उपस्थित हूबहू राक्षस समान होती है, और इन्हें ब्राह्मण का मास खास तौर पर खिलाया जाता है। ब्रह्मराक्षस में ब्राह्मण और राक्षस दोनों के गुण और अवगुण पाए जाते हैं इसीलिए इनके पास वरदान देने की भी ताकत उपलब्ध है।  शक्तिशाली आत्मा होने के बावजूद इनका मुक्ति पाना असंभव सा रहा। आप इनकी आकृति मंदिर के बाहर पा सकते हैं खासकर मध्य और दक्षिण भारत में।

संग्राम की काशी की सत्यकथा

ब्रह्मराक्षस के बारे में पूरी जानकारी ऊपर लेख में है। आज हम इनके साथ महातांत्रिक के काशी के श्मशान में चौदह रात्रि तक चले संग्राम की सत्यकथा लेकर आए हैं। इस सत्यकथा को हम कुछ इंजीनियरिंग के मदद से कह  पा रहे हैं जो इसके गवाह है।

यह पूर्ण घटना भारत के सबसे पुराने शहर या आप यूँ कह सकते हैं इस विश्व का सबसे पुराने शहर होने का तमगा हासिल हो , यह शहर है काशी। यह प्राचीन शहर महातांत्रिक की साधना स्थली थी। एक दिन महातांत्रिक ध्यान में बैठे थे,तभी अचानक बनारस-मिर्जापुर हाईवे पर चल रहे कार्य में मुख्य इंजीनियर अपने परिचित के साथ उनकी कुटिया में पहुंचे और शिकायत लगाई की उनके कार्य मे दो ब्रह्मराक्षस ने उत्पात मचाया हुआ है।

दोनों ब्रह्मरक्षसों ने अपनी ताकत से ज्ञानी व्यक्तियों का भी ज्ञान पूर्ण रूप से भूला देते थे, उन्हें अपने ऊपर बेहद घमंड हो गया था, इसके कारण उन्होंने 3 साल तक उस हाइवे पर काम नहीं होने दिया, जिससे सब इंजीनियर परेशान थे । दोनों ब्रह्मराक्षस अपनी मर्जी चलाने लगे इनके डर से अब कोई वहाँ नहीं आना चाहते थे। इंजीनियर इन बातों पर विश्वास नहीं करता था कि कोई ब्रह्मराक्षस जैसे कोई हो सकता है, परन्तु जब बात स्वयं के नौकरी पर पड़ी तो उसे महातांत्रिक की सहायता लेनी पड़ी। मुख्य इंजीनियर के साथ महातांत्रिक जा पहुंचे वहाँ। उन्होंने देखा वहाँ दो वृक्ष थे। बड़े बड़े कई सौ वर्षों पुराने। यहीं थे वो दोनों ब्रह्म-राक्षस। यहाँ तो द्वन्द सम्भव नहीं था। अत: उन्होंने उनको ही अब वहीँ उनके स्थान पर आमन्त्रित करने की सोची। आराम से और सुलभता से तो मानने वाले वो थे नहीं। अतः उन्होंने उन पेड़ों के मध्य में मूत्र-त्याग कर दिया और अपना चिन्ह अंकित कर दिया। इसके बाद महातांत्रिक अपने स्थान पर वापस हो गए। वापस आने पर महातांत्रिक तैयारी में जुट गए। अपने ध्यान स्थल में वह अकेले पहुंचे उन्होंने आह्वान किया आसन लगाकर और 21 कपाल सजाकर। इससे हुआ यह कि तेज हवा चलने लगी जिससे पेड़ झुक गए। यह क्रिया से ब्रह्मरक्षसों को क्रोध आ गया और दोनों ने ब्राह्मणों से माफी मांगने को कहा। यह सुनकर महातांत्रिक को भी गुस्सा आ गया। महातांत्रिक ने माफी मांगने से मना कर दिया जिससे दोनों पक्षों में युद्ध का अवसर पैदा हो गया जो 14 रात्रि तक चला इसमें गौर करने वाली बात यह थी कि यह युद्ध केवल रात को लड़ा जाता परन्तु सुबह होते ही इसे समाप्त कर दिया जाता क्योंकि ब्रह्मरक्षसों की ताकत रात को अधिक होती है। अंत में महातांत्रिक जो अच्छाई के लिए लड़ रहे थे अपनी सप्त-पाश विधा के कारण ब्रह्मरक्षसों को हरा पाए, इसके तुरंत बाद हाईवे का रुका हुआ कार्य आसानी से शुरू हो गया जिसमें कोई रुकावट नहीं आई।

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