महाभारत

महाभारत – किसने लिया किसका अवतार

वेदव्यास जी द्वारा रचित काव्यग्रंथ महाभारत जो कि हिन्दू धर्म का पौराणिक धार्मिक ग्रंथ है। जिसमे न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या तथा धर्मशास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया हैं। यह सभी का मार्गदर्शन करता है। इस ग्रन्थ में जीवन से जुड़े हर प्रश्न के उत्तर हैं जो स्वयं श्रीकृष्ण जी द्वारा दिए गए हैं। तभी इसे साहित्य की सबसे अनुपम कृतियों में से एक माना जाता है, किन्तु आज भी यह ग्रंथ प्रत्येक भारतीय के लिये एक अनुकरणीय स्रोत है। यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ भगवद्गीता सन्निहित है। पूरे महाभारत में लगभग 1,10,000 श्लोक हैं, जो यूनानी काव्यों इलियड और ओडिसी से परिमाण में दस गुणा अधिक हैं। यह महाकाव्य ‘जय संहिता’, ‘भारत’ और ‘महभारत’ इन तीन नामों से प्रसिद्ध हैं। महाभारत से जुड़े कई पात्र देवी-देवताओं के ही रूप हैं जिनमे सबसे प्रमुख इस सृष्टि के रचनाकर स्वंय भगवान श्रीकृष्ण जो कि भगवान विष्णु के अवतार हैं। महाभारत में इस बात का वर्णन भी किया है जिसमें कृष्ण जी ने कहा है कि “इस समाज में जो भी घटना गठित होती है उन सब पर मेरी ही मुहर होती है ‘। परन्तु सिर्फ भगवान कृष्ण ही बल्कि सभी पात्र किसी देवी या देवताओं के प्रतीक हैं या कहें अवतार हैं । जानते हैं सभी अवतारों के बारे में विस्तार से।

  • भगवान श्रीकृष्ण:- महाभारत में श्रीकृष्ण जी मुख्य पात्र था । इन्होंने ही अर्जुन को जीवन के कुछ ऐसे सीख दिए जो समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए कारगर है । श्रीकृष्ण जी भगवान विष्णु जी 8वें अवतार है।
  • बलराम:- हिन्दू पौराणिक मान्यता के अनुसार बलराम जी जो कि महाभारत में कृष्ण जी के भाई की भूमिका अदा कर रहे थे वह  श्री विष्णु के आसन बने शेषनाग के अंश माने जाते हैं। हालांकि महाभारत के युद्ध में बलराम किसी भी पक्ष की ओर से नहीं लड़े मान्यता है कि वे युद्ध छोड़ तीर्थ यात्रा पर चले गये थे। इन्हें हलधर भी कहा जाता है।
  • भीष्म पितामह:- महर्षि वशीष्ठ के श्राप के कारण इंसान रूप में जन्म लेने वाले भीष्म पितामह का महाभारत में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन्होंने भीष्म प्रतिज्ञा की जिनके कारण ही इनका नाम भीष्म रखा गया। गंगा मैया की कोख से जन्मे भीष्म 8 वसुओं में से एक थे।
  • गुरु द्रोणाचार्य:- यह महाभारत काल से आज तक के सबसे प्रसिद्ध लोकप्रिय आदर्श गुरु में से रहे हैं जिनके नाम से आज के भारत में सर्वश्रेष्ठ गुरु को इनाम दिया जाता है । कहा जाता है कि देवगुरु बृहस्पति देव ने ही गुरू द्रोणाचार्य जी के रूप में महाभारत काल में जन्म लिया।
  • अश्वत्थामा:- यह पात्र महाभारत में गुरु द्रोणाचार्य जी के पुत्र कहलाए गए , मान्यता है कि युद्ध के पश्चात मिले श्राप से आज भी उनकी आत्मा भटक रही है। यह स्वयं महाकाल, यम, क्रोध, काल के अंशावतार थे।
  • कर्ण:- महाभारत में कर्ण का पात्र कुंती के ज्येष्ठ पुत्र थे जो सूर्यदेव के आशीर्वाद से जन्मे थे । कुंती जो कि अविवाहित थी समाज के भय से कर्ण को छोड़ दिया। मान्यता है कि पूर्व जन्म कर्ण एक असुर थे जिन्होंने अपने तप से एक हजार रक्षा कवच हासिल किये थे इसी कारण उसका नाम सहस्त्रकवच पड़ गया था।
  • दुर्योधन:- जैसे कि सबकी ज़िंदगी में कोई न कोई खलनायक की भूमिका निभाता ही है तो महाभारत में भला कोई क्यों न हो। यहाँ सबसे बड़े खलनायक की भूमिका दुर्योधन ने निभाई। इनका जन्म के वक्त नाम सुयोधन रखा गया परन्तु अपने कर्म के कारण दुर्योधन नाम से पहचान मिली।
  • अर्जुन:- अर्जुन जो महाभारत में प्रबल तीर कमान के खिलाड़ी रहे। गुरु द्रोणाचार्य के सबसे प्रिय छात्र। यह इंद्र-कुंती के पुत्र थे। देवराज इन्द्र ने अर्जुन को बचाने के लिए कर्ण के कवच और कुंडल उनसे छल द्वारा छीन लिए थे। देवराज इन्द्र एक ब्राह्मण के वेश में पहुंच गए कर्ण के द्वार और उनसे दान मांग लिया।
  • भीम:- भीम जो कि पांडव में पांचों में सबसे ताकतवर शरीर था इन्हें पवनपुत्र भी कहा जाता है। पवनपुत्र यह नाम हनुमान जी का भी है। भीम ने बलराम से गदा युद्ध सीखा था। भीम ने ही दुर्योधन और दुःशासन सहित गांधारी के 100 पुत्रों को मारा था। द्रौपदी के अलावा भीम की पत्नी का नाम हिडिंबा था जिससे भीम का परमवीर पुत्र घटोत्कच पैदा हुआ था। घटोत्कच ने ही इन्द्र द्वारा कर्ण को दी गई अमोघ शक्ति को अपने ऊपर चलवाकर अर्जुन के प्राणों की रक्षा की थी।
  • द्रौपदी:- द्रौपदी जिनका महाभारत में चीरहरण का वाक्य समाज का अलग दृश्य प्रस्तुत करता है। द्रौपदी इंद्र देव की पत्नी इंद्राणी का अवतार माना जाता है।
  • रुक्मणि:- रुक्मणि जी जो कि कृष्ण जी की अर्धांगिनी थी वह विष्णु जी की धर्म पत्नी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है।
  • विदुर:- सूर्य के अंश धर्म ही विदुर के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनका जन्म की स्थिति हूबहू या कहें कुछ हद तक कर्ण की तरह थे। इनको भी इतनी योग्यता के बावजूद अपना अधिकार नहीं मिला। पांडू, धृतराष्ट्र और विदुर तीनों ही महर्षि वेदव्यास की संतान थे, लेकिन धृतराष्ट्र व पांडू अंबिका व अंबालिका की कोख से जन्मे तो विदुर ने दासी की कोख से जन्म लिया, धृतराष्ट्र जन्मांध तो पांडू अशक्त पैदा हुए थे जबकि विदुर हष्ट पुष्ट लेकिन दासी से जन्म लेने के कारण वे राजा सिंहासन नहीं पा सके और ताउम्र अपमानित होना पड़ा। मान्यता है कि विदुर पूर्व जन्म में यमधर्म थे जिन्हें झगड़े के फलस्वरूप अणिमांडव्य ऋषि ने शाप दिया था।
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