श्री दुर्गा सप्तशती पाठ

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ की सही विधि-आप कैसे करते हैं?

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माँ और बच्चों का रिश्ता संसार का सबसे अनमोल रिश्ता माना गया है। मां से कुछ भी प्रेम भावना से मांगो तो माँ अवश्य उस मांग को पूर्ण करती है। तभी माँ के भक्त रूपी बच्चे नवरात्रों का इंतजार बेसब्री से करते हैं। उनके मन में माँ के लिए श्री दुर्गा सप्तशती पाठ करने की लालसा रहती है , परन्तु कई भक्त समय के अभाव के कारण इस पूजा विधि को करने से बचते हैं। परन्तु कई यह पूजा विधि निभाते हैं पर विधि सही न होने के कारण इस पूजा का हानिकारक प्रभाव देखने को मिलता है।

माँ चंद्रघंटा – नवरात्र का तीसरा दिन माँ दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा विधि

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ कैसे करना चाहिए।

इस पाठ की शुरुआत के पूर्व श्री दुर्गा माँ की मूरत या तस्वीर को पूर्ण रूप से साफ करें और मंदिर में मूरत संग कलश की स्थापना करें। दुर्गा सप्तशती को महान तंत्र ग्रंथ के रूप में माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है इस पाठ को पूर्ण विधि विधान से करना चाहिए। इसके करने से भक्तो को मनचाहा फल मिलता है, परन्तु अगर इसके विधि विधान निभाने में कोई चूक हुई तो उसका परिणाम अति असहनीय हो सकता है। इसलिए किसी अन्य देवी-देवता की पूजा-आराधना में भले ही आप विधि व नियमों पर अधिक ध्यान न देते हों, लेकिन यदि आप नवरात्रि में दुर्गा पाठ कर रहे हैं, तो पूर्ण सावधानी बरतना व विधि का पूर्णरूपेण पालन करना जरूरी है। दुर्गा-सप्तशती पाठ शुरू करते समय सर्व प्रथम पवित्र स्थान (नदी किनारे की मिट्टी) की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं। हमारे द्वारा किया गया दुर्गा पाठ किस मात्रा में और कैसे स्‍वीकार हुआ, इस बात का पता इन जौ या गेंहू के अंकुरित होकर बडे होने के अनुसार लगाया जाता है। यानी यदि जौ/गेहूं बहुत ही तेजी से अंकुरित होकर बडे हों, तो ये इसी बात का संकेत है कि हमारा दुर्गा पाठ स्वीकार्य है जबकि यदि ये जौ/गेहूं अंकुरित न हों, अथवा बहुत धीमी गति से बढें, तो तो ये इसी बात की और इशारा होता है कि हमसे दुर्गा पाठ में कहीं कोई गलती हो रही है। फिर उसके ऊपर कलश को पंचोपचार विधि से स्थापित करें। कलश के ऊपर मूर्ति की भी पंचोपचार विधि से प्रतिष्ठा करें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों ओर त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र, पुस्तक तथा शालीग्राम को विराजित कर विष्णु का पूजन करें।

माँ ब्रह्मचारिणी – नवरात्र का दूसरा दिन माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा विधि

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ पुस्तक का मंत्र

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।

प्रकृत्यै भद्रायैनियता:प्रणता:स्मताम्॥

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए ग्रंथ पूजन के बाद श्री देवी कवच, श्री अर्गला स्तोत्रम्, श्री कीलक स्तोत्र का पाठ जरूर कर लेना चाहिए. उसके बाद माता का सिद्ध मंत्र नवार्ण मंत्र “ऊं ऐं ही क्लीं चामुण्डायै विच्चै” की एक माला जप लेनी चाहिए । नवार्ण मंत्रः ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै।

इन बातों का विशेषकर ध्यान रखें

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ की शुभ शुरुआत करने के पूर्व भगवान गणेश जी की आराध्य करें। अगर कलश स्थापना की गई है तो कलश पूजन, नवग्रह पूजन एवं ज्योति पूजन किया जाना आवश्यक है। श्री दुर्गा सप्तशती की पुस्तक को शुद्ध लाल कपड़े के ऊपर रखें। और इसका विधि पूर्वक कुंकुम,चावल और पुष्प से पूजन करें। तत्पश्चात स्वयं अपने माथे पर भस्म, चंदन या रोली लगाकर पूर्वाभिमुख होकर तत्व शुद्धि के लिए 4 बार आचमन करें।  यदि एक दिन में पूरा पाठ न किया जा सके, तो पहले दिन केवल मध्यम चरित्र का पाठ करें और दूसरे दिन शेष 2 चरित्र का पाठ करें। या फिर दूसरा विकल्प यह है कि एक, दो, एक चार, दो एक और दो अध्यायों को क्रम से सात दिन में पूरा करें। श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय यह विशेष ध्यान रखें कि पाठ स्पष्ट उच्चारण में करें, लेकिन जो़र से न पढ़ें और उतावले भी न हों। शारदीय नवरात्र में मां अपने उग्र स्वरूप में होती है। अत: विनयपूर्वक उनकी आराधना करें। नित्य पाठ के बाद कन्या पूजन करना अनिवार्य है। श्रीदुर्गा सप्तशती के प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित्र का क्रम से पाठ करने से, सभी मनोकामना पूरी होती है। इसे महाविद्या क्रम कहते हैं। दुर्गा सप्तशती के उत्तर,प्रथम और मध्य चरित्र के क्रमानुसार पाठ करने से, शत्रुनाश और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसे महातंत्री क्रम कहते हैं। देवी पुराण में प्रात:काल पूजन और प्रात में विसर्जन करने को कहा गया है।  

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