छठ पूजा

छठ पूजा का शुभ मुहूर्त, पूजा की विधि, और पूजा का महत्व और आरती

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छठ पूजा छठ पूजा का शुभ मुहूर्त

छठ पूजा मुख्यतः बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में मनाया जाने वाला त्यौहार है| अंग देश के राजा कर्ण सूर्यदेव के उपासक थे| अतः उसी परंपरा के अनुसार इस व्रत में सूर्य देव की पूजा की जाती है| छठ पूजा विशेष रूप से पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है|  यह व्रत चार दिवसीय पूजा का कार्यक्रम होता है| अंत में इसमें सूर्य को अर्घ्य देकर इसका समापन किया जाता है| हिन्दू पंचांग के अनुसार यह व्रत दिवाली के ठीक छः दिन बाद कार्तिक मॉस की शुक्ल पक्ष को चतुर्थी से लेकर सप्तमी तक मनाया जाता है|

इस वर्ष यह त्यौहार 13 नवम्बर 2018 दिन मंगलवार को मनाया जायेगा| कार्तिक मॉस में सूर्य अपनी नीच राशि राशि में होता है| षष्ठी तिथि पुत्र की आयु को प्रभावित करती है और सूर्य स्वस्थ्य का स्वामी है| अतः इस पूजा में पुत्र और स्वस्थ्य दोनों की रक्षा हेतु उपासन हो जाती है| इस माह में हम सूर्य की उपासना करके स्वस्थ्य और उर्जा के स्तर को बेहतर बना सकते है| इसे छठ पूजा, सूर्य षष्ठी या छठ व्रत भी कहते है|

छठ पूजा की विधि

छठ पूजा

लोगो में मान्यता यह है की महाभारत युद्ध के दौरान जब पांडव जब अपना राजपाठ जुएँ में हार गए थे| तब द्रोपदी ने छठ पूजा की थी और उपवास रखकर सूर्यदेव की उपासना की थी| इसके फलस्वरूप उन्हें उनका हारा हुआ राजपाठ वापस मिल गया था| तब से लेकर आज तक उससे प्रभावित क्षेत्रों और अब तो संपूर्ण भारत में इस पूजा का प्रचलन हो गया है| यह व्रत चतुर्थी तिथि से प्रारंभ होता है जिसमे व्रत रखने वाले को लगातार 36 घंटे तक बिना खाए पिए रहना होता है|

इस पूजा का पहला दिन कार्तिक मॉस की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है| इसे नहाय-खाय के नाम से जाना जाता है| इसमें सबसे पहले घर की साफ़-सफाई करके व्रत रखने वाली पवित्र तरीके से शुद्ध शाकाहारी तरीके से भोजन निर्माण करती है| भोजन ग्रहण करने के बाद व्रत प्रारंभ होता है| घर के सभी सदस्य व्रत रखने वाले सदस्य के बाद ही भोजन करते है|

छठ पूजा

अगले दिन कार्तिक मॉस की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पूरे दिन व्रत रखा जाता है तथा शाम को व्रत रखने वाले सदस्य भोजन करते है| इसे खरना कहते है| शाम को चावल और गुड़ की खीर बनायीं जाती है| नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है|

 

अगले दिन षष्ठी को चावल के लड्डू, ठेकुआ, इत्यादि प्रसाद के रूप में बनाया जाता है| शाम को डूबते हुए सूरज की पूजा की जाती है| व्रत रखने वाले सदस्य को स्नान करते हुए सूर्य को अर्घ्य देना होता है| यह पूजा नदी या तालाब पर जाकर की जाती है| अगले दिन सप्तमी को प्रातः फिर से शाम वाली विधि से पूजा की जाती है|

 

 

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