कर्म या किस्मत

कर्म या किस्मत

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कर्म या किस्मत यह सफल व्यक्ति की सफलता के दो प्रमुख कारण है। इसे आप सफलता के दो एक समान पहलू भी कह सकते हैं। अक्सर सफलता का मापदंड को बताते हुए इन दोनों कारणों में मतभेद पैदा कर दिए जाते हैं या खुद ब खुद हो जाते हैं। सफल व्यक्ति का क्रम केवल वो ही समझ पाता है जिसने उस व्यक्ति का अपने लक्ष्य के प्रति परिश्रम देखा हो तो वहीं किसी की सफलता के पीछे व्यक्ति के किस्मत श्रेय देने वाले लोग वही हैं जिन्हें व्यक्ति की सिर्फ सफलता दिखती है और उससे बदलती उसकी जिंदगी परन्तु उसकी मेहनत नही जान पाते। हालांकि प्राचीन वेदो मे किस्मत और कर्म को दो अलग अलग पहलु के रुप मे बताया गया है जो कभी न कभी हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। यह विषय थोड़ा जटिल और मुश्किल है। कर्म और किस्मत पर हज़ारो सालो से विद्वान और दार्शनिक लोगो के बीच मे बहस होती आई है, किसकी महत्ता ज़्यादा है और कौन ज़्यादा प्रभावशाली है इस पर अभी भी लोगो के विचार बहुत अलग है।

महाभारत – किसने लिया किसका अवतार

यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ भगवद्गीता सन्निहित है। पूरे महाभारत में लगभग 1,10,000 श्लोक हैं, जो यूनानी काव्यों इलियड और ओडिसी से परिमाण में दस गुणा अधिक हैं। 

कर्म क्या है ?

अगर आसान भाषा मे समझाया जाए तो कर्म हर वह कार्य जो आप अपनी स्वयं की इच्छा पूरी करने के लिए प्रयोग में लाते हैं। वेदो और पुराणो मे कर्म को मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म माना गया है। ईश्वर की परम कृपा पाने और जीवन को सफल बनाने के सिर्फ एक ही मार्ग है कर्म का मार्ग। ऐसा माना जाता है कि अपने जीवन मे हम जो भी कार्य करते उसका अच्छा या बुरा परिणाम हमे अवश्य मिलता है। जो भी सुख या दुख हम भोगते है वें कही न कही हमारे ही पिछले कर्मो का फल होते हैं। हमारा आज हमारे बिते हुए कल पर निर्भर करता है, और हमारा आने वाला कल हमारे आज पर निर्भर करता है। इसलिए भविष्य की गणना कभी भी पूर्णत: सही नही होती। कर्म किए बिना हम रह नहीं सकते। सब कर्म छोड़कर आलसी होकर बैठे रहें, फिर भी कुछ-न-कुछ मन से, तन से कर्म होंगे ही। कर्म के पलायन से कर्म का त्याग नहीं होता और कर्म करते रहने से भी कर्म का त्याग नहीं होता, कर्म करने में केवल सावधानी रखनी चाहिए। ऐसे तो आप कठोर न बोलें परंतु व्यवहार में, घर में, समाज में आपको गुस्सा करना पड़े तो यह भी कठोरता हुई। गुस्सा करके आप अंदर से तप जाते हो, दूसरे का अहित करते हो तो आपको हानि होती है पर गर्जना करके, फुफकार करके दूसरों को हानि से बचाते हो तो वह कठोरता दोष नहीं मानी जाती। तो कर्म का रहस्य समझना पड़ेगा।

और इसके लिए भगवान कहते हैं, ‘व्यवसायात्मिका’ बुद्धि हो। मतलब कि जो बुद्धि यह विचार करती है कि क्या करना है और उसका परिणाम क्या आएगा? आम आदमी की ‘अव्यवसायात्मिका’ बुद्धि होती है कि इन्द्रियों ने दिखा दिया, मन ने लोलुपता कर दी, बुद्धि सहमत हो गई और कर्म कर बैठे; इसी से लोग कर्मबंधन में, भोगबंधन में, आसक्ति-बंधन में पड़े हैं। कर्म तो करो किंतु कर्म के पीछे आप बुद्धियोग लगाओ कि आप जो कर्म करते हैं उसका फल क्या होगा? उसका परिणाम क्या होगा? उस कर्म की विधि क्या है? यह कर्म हमको बाँधेगा कि आत्मसुख में ले जाएगा? यह कर्म हमको स्वच्छंदी बनाएगा कि स्वतंत्र बनाएगा?

किस्मत किसे कहा जाता है ?

किस्मत का तमगा उस मनुष्य को प्राप्त होता है जिसके सफल होने का विश्वास विरोधियों को नहीं होता। विरोधी उस जितने वाले मनुष्य की जीत को किस्मत बताकर नीचा दिखा देते हैं। यह समाज का अटूट सत्य है कि किसी को भी बिना मेहनत जीत नहीं हासिल होती परन्तु किस्मत आपका साथ नही देगी तो आपकी हर मेहनत भी व्यर्थ जाएगी। किस्मत सिर्फ़ ज्योतिषों द्वारा बताई गयी सितारों की चाल नही जो आपका जीवन बदल देगी। कहते हैं ना कि जब आदमी सही वक़्त पर सही जगह मौजूद होता है तो उसके सभी काम बन जाते हैं? आम इंसान इसे किस्मत का नाम देता है लेकिन हक़ीक़त यह है कि सही वक़्त पर सही जगह होने के लिए आपको कर्म भी सही करने पड़ेंगे। अपने घर पर बैठे यह सोच लेना कि किस्मत में होगा तो मिल जाएगा, आपके काम नहीं आने वाला।

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