अन्नप्राशन संस्कार

अन्नप्राशन संस्कार – हिंदू धर्म में सातवां संस्कार है अन्नप्राशन

कहते हैं कि बंगाल में जन्मा व्यक्ति काफी मीठा स्वभाव होता तभी बंगाल के व्यक्ति बहुत अच्छे गायक बनते हैं ऐसा इसीलिए क्योंकि बंगाल की मिठाइयां की खासियत पूरे विश्व में है। एक कहावत बहुत प्रचलित है “जैसा खाया अन्न, वैसा होगा मन”। अर्थात जैसे भोजन तुम करोगे वैसा ही तुम्हारा स्वभाव होगा। अगर आप ज्यादातर सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं तो आपके अंदर सात्विक गुण आएंगे और अगर आप तामसिक भोजन करेंगे तो आपके अंदर तामसिक व्यवहार की ओर जाएंगे। इन भोजन से होते दोषों के बुरे प्रभाव को कम करने हेतु ही नवजात को पैदा होने के शुरुआती 6 महीने के बाद ही सप्तम संस्कार किया जाता है जिसे हम अन्नप्राशन भी कहते हैं।  पौराणिक मान्यता के अनुसार अन्नप्राशन संस्कार का जीवन में अलग ही महत्त्व है। 6 महीने तक केवल माँ का दूध ही शिशु के लिए आवश्यक बताया है और उसके बाद अन्न ग्रहण करने पर उसे अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है। इसके कई महत्ब भी है , जाने इसके बारे मे।

अन्नप्राशन का महत्व

माता के गर्भ में रहते हुए जातक में मलिन भोजन के जो दोष आते हैं उनके निदान व शिशु के सुपोषण हेतु शुद्ध भोजन करवाया जाना चाहिये यह वाक्य “अन्नाशनान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति”  का अर्थ है। अन्न किसी जीवन में क्या महत्व देता है , क्या खुशी देता है, यह आप किसी गरीब व्यक्ति से पूछे जिन्हें एक वक्त की रोटी भी नसीब नही हो पाती।

अन्न अपके शरीर को तन्दरुस्त और मजबूत बनाने में सहायता करती है , ताकि हर तमाम परेशानियों को झेल पाओ। अन्न के महत्व का एक अंश, कथा के तौर पर काफी प्रसिद्ध है।

यह अंश महाभारत का वह प्रसिद्ध अंश के ठीक बाद कि घटना है जब स्वंय कन्हैया एक औरत द्रोपदी के चीरहरण हुआ उसे बचाने हेतु प्रकट हुए। भीष्म पितामह जब पांडवों को उपदेश दे रहे थे, अच्छी बातों का ज्ञान दे रहे थे , तभी उनकी यह बात सुनते हुए अचानक से द्रोपदी जोर जोर से हसने लगती है , जिससे भीष्म पितामह का ध्यान भंग हो जाता है और वह उपदेश छोड़ द्रोपदी से विनर्मता से उसके हसने का कारण पूछते हैं। द्रोपदी ने कहा की पितामह आपकी अच्छी उपदेश , बहुत अच्छे होते हैं और सुनने में भी अच्छा लगता है,परन्तु जब यह सोचती हूँ कि आपका यह उपदेश उस वक्त कहाँ गया था जब मेरा चीरहरण भरी सभा मे हो रहा था, तब कहाँ खो गई थी यह आवाज, तब कहाँ विलुप्त हो गई थी यह धर्म की बातें , इसीलिए मुझे आज आपकी यह बातें सुनकर हसी आ गई। भीष्म पितामह यह बात सुनकर उतर देते है “पुत्री , उस वक्त मैं जो अन्न का ग्रहण करता था, वह अन्न दुर्योधन का था उसी अन्न से मेरे अंदर का बहता रक्त बनता था। जैसा पापी वह दुर्योधन था वैसा ही अन्न मुझे प्राप्त हुआ । परन्तु अर्जुन के बाणों ने वह पापी रक्त भ दिया , अब मैं वही कहता हूँ जो धर्मानुकूल हैं।

कैसे निभाए अन्नप्राशन संस्कार

अन्नप्रासन संस्कार सातवां संस्कार है । जिसकी क्रिया नवजात शिशु के 6 महीने पश्चात ही शुरआत होता है । इन 6 महीनों में केवल माँ का दूध ही नवजात के लिए उपयुक्त है । जिसे गुजरने के बाद शिशु को भात, दही, शहद और घी आदि को मिश्रित कर खिलाया जाता है । शुद्ध और साफ अन्न शिशु के विकास का रथ निर्धारित करता है ।

शिवौ ते स्तां व्रीहीयवावबलासावदोमधौ।

एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतौ अंहस:।।

यह मंत्र का उच्चारण माता पिता को शिशु को मिश्रित प्रसाद चटकाया जाता है ।

इस मंत्र का अर्थ है कि यह प्रसाद शिशु को शक्ति और पुष्टकारक हो।

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